मंगलवार, 17 नवंबर 2020

*९. निहकर्मी कौ अंग ~ १७/२०*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
https://www.facebook.com/DADUVANI
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
.
*९. निहकर्मी कौ अंग ~ १७/२०*
.
कौंण कथै उस ग्यांन कूं, कौण सुणैं मन लाइ ।
कहि जगजीवन रांम रस, जे हरि प्यावै आइ ॥१७॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि कौन तो उस ज्ञान को सुनते हैं और कौन प्रभु के बंदे कहते हैं जिस ज्ञान रुपी अमृत को प्रभु अपने जन को देते हैं वे अनुरागी जीव ही हैं जो हरिनाम कहते व सुनते हैं ।
.
कौंण नांव तजि तप करै, कौंण गुफा गिरि जाइ ।
कहि जगजीवन रांम रटि, जे रांमहि मांहि समाइ ॥१८॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि सबसे सहज राम स्मरण है, इसे त्याग कर कौन तप करें, या गुफाओं में साधना करनें जायें, जो राम स्मरण करते हैं वे राम में ही समाये रहते हैं ।
.
कौंण धरी अंग पर धरै, कोंण करै बहु भेख३ ।
कहि जगजीवन चित्त बस्यौ, अविगति अकल४ अलेख ॥१९॥
(३. भेख=अनेक सम्प्रदायों के वस्त्र) (४. अकल=अखण्ड)
संतजगजीवन जी कहते हैं कौन विभिन्न मुद्राओं में बैठे, कौन भात़िं भातिं के भेष करें, सबसे सहज है उन अविगत काल से परे प्रभु को चित में रखना ।
.
सिद्धि भै नर सक्ति मंहि५, अबध मुकति पद लीन ।
कहि जगजीवन हरि भगत, सहज सुन्नि चित दीन ॥२०॥
(५. सिद्धि भै नर सक्ति महिं=साधक को *योगसाधना पूर्ण कर पायगा कि नहीं*~यह भय ही बना रहता है)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो साधक है वे भयत्रस्त हैं कि साधना निर्बाध होगी या नहीं । और कुछ मुक्ति की चिंता में हैं । संत कहते हैं कि भक्त तो शून्य में ही मस्त है ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें