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*दादू रामनाम जलं कृत्वां, स्नानं सदा जित: ।*
*तन मन आत्म निर्मलं, पंच - भू पापं गत: ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ स्मरण का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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(२)
*अछूतों की समस्या-अस्पृश्य जाति की हरिनाम से शुद्धि*
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हरिभक्ति होने पर फिर जाति का विचार नहीं रहता । श्रीरामकृष्ण मणि मल्लिक से कह रहे हैं, “तुम तुलसीदास की वह बात कहो तो ।”
मणि मल्लिक- चातक की प्यास से छाती फटी जाती है-गंगा, यमुना, सरयू आदि कितनी नदियाँ और तालाब हैं, परन्तु वह कोई भी जल नहीं पीता, केवल स्वाति नक्षत्र की वर्षा के जल के लिए ही मुँह खोले रहता है !
श्रीरामकृष्ण- अर्थात् उनके चरणकमलों में भक्ति ही सार है शेष सब मिथ्या ।
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मणि मल्लिक- तुलसीदास की एक और बात-स्पर्शमणि से लगते ही, अष्टधातु सोना बन जाती है । उसी प्रकार सभी जातियाँ – चमार चाण्डाल तक हरिनाम लेने पर शुद्ध हो जाती हैं । और वैसे तो ‘बिना हरिनाम चार जात चमार !’
श्रीरामकृष्ण- जिस चमड़े की खाल छूनी भी नहीं चाहिए, उसी को पका लेने के बाद फिर देवमन्दिर में भी ले जाते हैं !
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“ईश्वर के नाम से मनुष्य पवित्र होता है । इसीलिए नामसंकीर्तन का अभ्यास करना चाहिये । मैंने यदु मल्लिक की माँ से कहा था, ‘जब मृत्यु आएगी, तब यही संसार की चिन्ता होगी । परिवार, लड़के-लड़कियों की चिन्ता, मृत्युपत्र की चिन्ता – यही सब चिन्ताएँ आएँगी; भगवान् की चिन्ता न आयगी । उपाय है उनके नाम का जप करना, नाम-कीर्तन का अभ्यास करना । यदि अभ्यास रहा, तो मृत्यु के समय में उन्हीं का नाम मुँह में आयगा । बिल्ली के पकड़ने पर चिड़िया की ‘च्याँ, च्याँ’ बोली ही निकलेगी । उस समय वह ‘राम राम’ ‘हरे कृष्ण’ न बोलेगी ।’
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“मृत्यु समय के लिए तैयार होना अच्छा है । अन्तिम दिनों में निर्जन में जाकर केवल ईश्वर का चिन्तन तथा उनका नाम जपना । हाथी को नहलाकर यदि हाथीखाने में ले जाया जाए तो फिर वह अपनी देह में मिट्टी-कीचड़ नहीं लगा सकता ।”
बलराम के पिता, मणि मल्लिक, वेणी पाल ये अब वृद्ध हो गए हैं; क्या इसीलिए श्रीरामकृष्ण उनके कल्याण के लिए ये सब उपदेश दे रहे हैं ?
श्रीरामकृष्ण फिर भक्तों को संबोधित करके बातचीत कर रहे हैं ।
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श्रीरामकृष्ण- एकान्त में उनका चिन्तन और नामस्मरण करने के लिए क्यों कहता हूँ ? संसार में रातदिन रहने पर अशान्ति होती है । देखो न, एक गज जमीन के लिए भाईभाई में मारकाट होती है ।
“सिक्खों का कहना है कि जमीन, स्त्री और धन – इन्हीं तीनों के लिए इतनी गड़बड़ तथा अशान्ति होती है ।
“तुम लोग संसार में हो तो इसमें भय क्या है ? राम ने जब संसार छोड़ने की बात कही, तो दशरथ चिन्तित होकर वशिष्ठ की शरण गए । वशिष्ठ ने राम से कहा, ‘राम, तुम क्यों संसार को छोड़ोगे ? मेरे साथ विचार करो, क्या संसार ईश्वर से अलग है ? क्या छोड़ोगे और क्या ग्रहण करोगे ? उनके अतिरिक्त और कुछ नहीं है । वे ईश्वर, माया, जीव, जगत् सभी रूप में प्रकट हो रहे हैं ।’
बलराम के पिता-बड़ा कठिन है ।
श्रीरामकृष्ण- साधना के समय यह संसार धोखे की टट्टी है, फिर ज्ञान प्राप्त करने के बाद, उनके दर्शन के बाद, वही संसार – *आनन्द की कुटिया* है ।
(क्रमशः)

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