शुक्रवार, 6 नवंबर 2020

शब्द का अंग २२ - ६/१०

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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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(#श्रीदादूवाणी ~ शब्द का अंग २२ - ६/१०)
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*दादू ओंकार तैं ऊपजै, अरस परस संजोग ।*
*अंकुर बीज द्वै पाप पुण्य, इहि विधि जोग रु भोग ॥६॥*
इस साखी में ओंकार शब्द से लक्षणावृत्ति से वाग्तत्व अर्थ जानना । क्योंकि वाक् तत्व का ही यह सारा संसार परिणाम है । माण्डूक्य उपनिषद् में कहा है कि जो कुछ भूत भव्य संसार दीख रहा है यह सब ओंकार ही है जो त्रिकालातीत है वह भी ओंकार स्वरूप ही है ।
वाक्यपदीय में लिखा है कि-वाच्य वाचक भेद से भिन्न प्रतीत होने वाला यह संसार सूक्ष्म शब्द जो व्यक्त है उसी का यह परिणाम है ऐसा वेदवेत्ता पुरुष कहते हैं । हम स्वयं कल्पना करके नहीं कहते । सृष्टि के आदि में यह विश्व छन्द से(सूक्ष्म वाक् तत्व से) ही पैदा होता है । 
वेद में भी कहा है कि- बुद्धिरूप से स्थित जो सूक्ष्म वाक्तत्व है उसी से संपूर्ण जगत् वाच्य वाचक उभय रूप से प्राण और इन्द्रियों को द्वार बनाकर पैदा हुआ है । मंत्र में इत् शब्द का अवधारण अर्थ है । न केवल मर्त्य अमर्त्य रूप जो भी उभयस्वरूप है उसी रूप से ही पैदा हुआ है अपितु भोक्ता रूप से भी पैदा हुआ है । उसी को मंत्र में- कह रहे हैं कि-“अथेद् वाक् बुभुजे” अर्थात् वाक् तत्व ही भोक्ता है । जो अन्दर ज्ञाता ज्ञेय रूप से स्थित है वह वाक् तत्व ही हैं । जो कुछ मनुष्य नाना प्रकार से शब्दाभिधेय अर्थ तत्त्व को अनेक प्रकार से बोलता है वह भी सब वाक् तत्त्व ही है । वाणी से दूसरा कोई कुछ है ही नहीं । क्योंकि वाक् तत्त्व सबका उपादान कारण होने से और सृष्टि की उत्पत्ति में पाप पुण्य रूप अंकुर सहकारी कारण माने गये हैं । इस प्रकार विचार करने पर भोग्य भोक्तृज्ञेय ज्ञानरूप सकल विश्व वाणी से उत्पन्न होने के कारण वाक् रूप ही है ।
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*ओंकार तैं ऊपजै, विनशै बहुत विकार ।*
*भाव भक्ति लै थिर रहै, दादू आतम सार ॥७॥*
*पहली किया आप तैं, उत्पत्ति ओंकार ।*
*ओंकार तैं ऊपजै, पंच तत्त्व आकार ॥८॥*
*पंच तत्त्व तैं घट भया, बहु विधि सब विस्तार ।*
*दादू घट तैं ऊपजै, मैं तैं वर्ण विकार ॥९॥*
शब्दतत्त्वात्मक ब्रह्म से प्रथम ब्रह्मस्वरूप त्रिमात्रिक ओंकार की उत्पत्ति होती है । उसके बाद अक्षर समाम्नाय पैदा होते हैं । तदन्तर चारों वेदों को बनाकर सारे जगत की रचना होती है । उसके पश्चात् पञ्चतन्मात्रादि क्रम से पञ्चभूतों की उत्पत्ति होती है । पंचीकृत पञ्चभूतों से नाना सृष्टि का विस्तार हो जाता है और अन्तःकरण में तव मम यह अभिमान तथा कामादि विकार पैदा होते हैं । इस तरह कार्यकारण के अभेदोपचार से सारा विश्व ही ओंकारमय है । 
श्रुति में लिखा है कि- “वाणी ही अर्थ को देखती है वाणी ही अर्थ को बोलती है । वाणी ही अर्थ को फैलाती है । वाणी में ही नाना रूपवान् जगत निहित है । अतः सब विश्व का ओंकार ही कारण है । तथा ओंकार के ब्रह्ममय होने से सब ब्रह्मस्वरूप ही जगत् है । अतः साधक को मिथ्यामय संसार को त्याग कर ब्रह्म का ही ध्यान करना चाहिये । क्योंकि निर्विकल्प चिदात्मा में किसी भी प्रकार के भेद का अवसर ही नहीं आ सकता ।” 
विवेकचूडामणि में- ब्रह्म में जो यह संसार की कल्पना है यह सब असत्य ही है । क्योंकि वह निर्विकार निराकार निर्विशेष है, उसमें भेद भ्रान्ति के अलावा हो ही नहीं सकता और भ्रान्ति से कल्पित भेद तो मिथ्या है ।
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*एक शब्द सब कुछ किया, ऐसा समर्थ सोइ ।*
*आगै पीछे तो करै, जे बलहीना होइ ॥१०॥*
एक बार श्री दादू जी महाराज से अकबर बादशाह ने पूछा कि हे भगवन् ! आप यह बतलाइये कि पहले नारी बनी या पुरुष बना ! प्रश्न का अभिप्राय है कि पुरुष बिना नारी नहीं हो सकती और नारी बिना पुरुष कहां से आया । अतः सृष्टि का क्रम कैसे चला? उत्तर का आशय यह है की हे राजन् जो परमात्मा सर्वशक्तिसंपन्न है वह एक शब्द से ही उत्पत्ति पालन संहार कर सकता है । अतः तुम्हारा प्रश्न ही सृष्टि कर्ता के विषय में अनुपन्न है । क्योंकि वह सर्व शक्ति संपन्न है । आगे पीछे तो वह करता है जो सर्व समर्थ नहीं हो । इसीलिये लिखा है कि- सृष्टि के विषय में विचार करने वाले लोगों ने इस सृष्टि को परमात्मा की विभूति बतलायी है । कुछ विद्वानों ने अपना मत अभिव्यक्त किया कि यह सृष्टि स्वप्न की तरह मायाकृत होने से मिथ्या है । अर्थात् भ्रान्ति से ही कल्पित है जैसे रस्सी में सर्प की कल्पना भ्रान्तिजन्य है । कुछ लोगों ने प्रभु की इच्छा को ही कारण माना है । कुछ काल से जो निरन्तर काल का विचार करते रहते हैं इस सृष्टि की उत्पत्ति मानी है । कुछ का कहना है कि जीवों के भोग के लिये ही इस सृष्टि की रचना की है । कुछ का कहना है कि यह सृष्टि केवल प्रभु की क्रीड़ा है और कुछ नहीं है । कुछ विद्वानों का मत है कि यह प्रभु का स्वभाव है कि वे एक से अनेक और अनेक से एक बन जाते हैं । अतः भगवान के अलावा सृष्टि कुछ है ही नहीं, भगवान् ही सृष्टि के रूप में दीखते हैं ।
(क्रमशः)

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