गुरुवार, 19 नवंबर 2020

*हरि छांह करैं मुख धोय निहारैं*

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*जीव पियारे राम को, पाती पंच चढाइ ।*
*तन मन मनसा सौंपि सब, दादू विलम्ब न लाइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,* 
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान* 
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
*अन्यात-*
*गोद धरैं अँखियाँ जु भरैं,*
*हरि छांह करैं मुख धोय निहारैं ।*
*पूंछत पक्षन लक्षन हैं क्षत१,*
*वा२ इक चुंगल३ चौंच सुधारैं ॥*
*मोचत४ आसुन सोचत राम,*
*सह्यो दुःख मो-हित गीध विचारैं ।*
*आपन हाथन श्री रघुनाथ,*
*जटायु की धूरि जटान से झारैं ॥४०॥*
जटायु की गर्दन को राम अपनी गोद में धरते हैं, नेत्रों में अश्रु जल भरते हैं, छाया करते हैं, जटायु के मुख को धोकर देखते हैं । लक्ष्मणजी एक हाथ से उसके पंखों और घावों१ को पूँछते हैं और एक से उसके२ पंजे३ तथा चौंच को सुधारते हैं । रामजी आँसूओं को गिराते४ हुये चिन्ता कर रहे हैं- इस बेचारे गीध ने मेरे लिये कितना दुःख सहन किया है । इस प्रकार विचार करते हुये श्री रघुनाथजी अपने हाथों में अपनी जटा लेकर जटायु के शरीर की धूलि झाड़ कर साफ कर रहे हैं । और भी कहा है- 
*दीन मलीन अधीन सु अंग,*
*विहंग परो क्षिति खिन्न दुखारी ।*
*‘राघव’ दीन दयालु कृपाल को,*
*देख दुखी करुणा भइ भारी ॥*
*गीध को गोद में राखि कृपा निधि,*
*नैन सरोजन में भर वारी ।*
*बारहि बार सुधारत पंख,*
*जटायु की धूरि जटान से झारी ॥*
(क्रमशः)

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