बुधवार, 18 नवंबर 2020

= १८२ =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*दादू जहाँ कनक अरु कामनी, तहँ जीव पतंगे जांहि ।*
*आग अनंत सूझै नहीं, जल-जल मूये माँहि ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ मन का अंग)*
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साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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दक्षिण प्रान्त में कृष्ण वीणा नदी के तट पर एक गांव मे रामदास नामक एक भक्त ब्राह्मण रहते थे, उनके पुत्र का नाम विल्वमंगल था ।
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पिता के मरने पर उसका चिन्तामणी नामक वैश्या से प्रेम हुआ, उसके बिना वह नहीं रह सकता था । पिता के श्राद्ध के दिन देर हो गई ।
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चिन्तामणि और इसके गांव के मध्य नदी थी, उसका पानी बहुत बढा हुआ था ।
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रात्रि में विल्वमंगल नदी तट पहँचा और एक मुरदे को चिंतामणि का भेजा हुआ काष्ठ समझ उसके ऊपर चढकर पार गया । चिंतामणि का घर बंद था ।
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उसकी अटारी की छत की मोरी में लटकते हुए सर्प को रेशम की डोरी जान, पकड़कर ऊपर जा चढा ।
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चिंतामणि ने पूछा - तुम कैसे आये । विल्वमंगल - तेरे भेजे हुए काष्ठ से नदी पार करके तथा तेरे लटकाई हुई डोरी से चढकर ।
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चिंतामणि - मैंने न काष्ठ भेजा है न डोरी लटकाई है । फिर चिंतामणि ने उसे साथ लेकर देखा तो सर्प और मुर्दा मिला ।
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चिंतामणि बोली - विल्व ! जैसा तुमने मुझसे प्रेम किया है वैसा हरि से करते तो तुम्हारा कल्याण हो जाता । आगे चलकर दोनों कृष्ण भक्त बने ।
नहीं रहे कामान्ध को, तिय तज पर का ज्ञान ।
देख विल्वमंगल नहीं, शव अहि सका पिछाण ॥२॥

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