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🦚 #श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका 🦚
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भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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(#श्रीदादूवाणी ~ समर्थता का अंग २१ - ३७/४१)
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*पंच ऊपना शब्द तैं, शब्द पंच सौं होइ ।*
*सांई मेरे सब किया, बूझे बिरला कोइ ॥३७॥*
सूक्ष्मतन्मात्राओं द्वारा क्रमशः पञ्चसूक्ष्म भूतों की उत्पत्ति होती है । उन्हीं पंचीकृत पञ्चभूतों से उत्पन्न शरीर से ध्वन्यात्मक तथा वर्णात्मक शब्द पैदा होता है । इस क्रम से सारा जगत् परब्रह्म परमात्मा से ही उत्पन्न होता है परन्तु उसकी इस जगद् रचना सामर्थ्य को सब लोग नहीं जानते हैं ।
वाक्यपदीय में लिखा है कि- जो अक्षर ब्रह्म उत्पत्ति विनाश रहित है तथा ककारादि वर्ण रूप वैखरी वाणी का निमित्त है । एवं वाह्यार्थ बोधन की भावना से घट पट आदि अर्थ रूपेण विवर्त रूप से भासता है । तथा जगत् की सारी प्रक्रिया और व्यवहार जिससे होता है वह पश्यन्ती मध्यमा रूप शब्द तत्त्व ही ब्रह्म है ।
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*है तो रती, नहीं तो नांहीं, सब कुछ उत्पति होइ ।*
*हुक्मैं हाजिर सब किया, बूझे बिरला कोइ ॥३८॥*
क्षणभंगुर संसार को जब बनाने की इच्छा होती है तब प्रभु संकल्पमात्र से ही बना देते हैं । संहार की इच्छा से क्षण में ही संहार कर देते हैं । अतः जगत् की उत्पत्ति विनाश यह सब भगवान् के हाथ में है । इस रहस्यमयी सामर्थ्य को विरले ही जानते हैं ।
श्रुति में लिखा है- संकल्प मात्र से जिसने यह सृष्टि बनाई । उसीसे उत्पन्न होते हैं और उसीसे जीते हैं उसी में लीन हो जाते हैं । वह ही ब्रह्म है उसको जानो ।
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*नहीं तहाँ तैं सब किया, आपै आप उपाइ ।*
*निज तत न्यारा ना किया, दूजा आवै जाइ ॥३९॥*
इस मिथ्या माया के द्वारा परमेश्वर अपनी सत्ता से पञ्चभूतादि क्रम से सारे जगत् को पैदा तथा नष्ट करते हैं । जिन्होंने उस ब्रह्म को जान लिया वे मुक्त हो गये । अन्य तो संसार में जन्मते मरते रहते हैं ।
गीता में- हे अर्जुन संपूर्ण भूत इन परा अपरा प्रकृति से परमात्मा के द्वारा उत्पन्न होते हैं । अतः मैं ही संपूर्ण जगत् का उत्पन्न करने वाला तथा नाश करने वाला हूं । मुझसे दूसरा कोई इस जगत् का परम कारण नहीं है । संपूर्ण जगत् सूत्र में मणियों के सदृश मुझ में गूंथा हुआ है ।
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*नहीं तहाँ तैं सब किया, फिर नांहीं ह्वै जाइ ।*
*दादू नांहीं होइ रहु, साहिब सौं ल्यौ लाइ ॥४०॥*
हे प्रभो ! स्वयं निर्गुण निर्विकारवान् होते हुए भी सगुण विकारवान् जगत् की रचना करने के कारण आप अद्भुत सामर्थ्यवान् हैं और आपको जानने मात्र से सगुण सवीकार पुरुष भी निर्गुण निर्विकार हो जाता है । यह आपका ज्ञान भी अद्भुत शक्तिशाली है । आलविन्दारस्तोत्र में हे भगवन् आपके अनन्त करोड़ कलाओं के प्रकाश के भी अंश में यह जड़ चेतन रूप विचित्र संसार विभागपूर्वक स्थित है । अण्ड ब्रह्माण्ड स्थित सर्व वस्तु, दश, ऊपर के आवरण, तीन गुण, प्रकृति, पुरुष परमपद और परात्पर ब्रह्म, यह आपकी ही विभूतियां हैं । अतः साधक को चाहिये कि उसके ज्ञान के द्वारा सतत उस ब्रह्म में निमग्न रहे ।
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*दादू खालिक खेलै खेल कर, बूझै बिरला कोइ ।*
*लेकर सुखिया ना भया, देकर सुखिया होइ ॥४१॥*
यह संसार परमात्मा के खेलने का स्थान है इसमें प्राणियों की उत्पत्ति विनाश रूप खेल प्रतिदिन हो रहा है । अतः इस संसार को विचार दृष्टि से देखें तो न यह कभी पैदा होता है और न यह नष्ट ही होता । जैसे रज्जु में सर्प की प्रतीति मात्र है वह कभी पैदा नहीं हुआ । इसी तरह संसार भी केवल खेल है । और यह परमात्मा प्राणियों से कुछ लेना नहीं चाहता क्योंकि वह निष्काम है । प्रत्युत सदा देता ही रहता है । और देकर बहुत खुश होता है । इसलिये इस संसार को परमात्मा का ही मानना चाहिये । जो अपना मानकर उन पदार्थों में अध्यास करके कहता है कि यह मेरी है । वह मूर्ख है और दुःख पाता है । यदि देना ही है तो प्रभु को अपना मन समर्पण करना चाहिये ।
लिखा है कि- हे प्रभो आपका महल रत्नों से बना हुआ है और गृहिणी श्री लक्ष्मी जी हैं । और यह जगत् आपका है अतः इसमें कोई वस्तु आप को दे नहीं सकते क्योंकि वह तो सब आपकी ही है । किन्तु श्री राधा जी ने आपका मन हरण कर लिया है । अतः आप बेमना हैं । मैं आपको अपना मन दे रहा हूँ कृपया उसको ग्रहण कीजिये ।
(क्रमशः)

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