मंगलवार, 3 नवंबर 2020

(“पंचमोल्लास” ४६/४८)

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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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(“पंचमोल्लास” ४६/४८)
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*संत प्रतापन अंत कहूं, कहत न आवे और ।* 
*कीरति कही सतसंग की, जेतक बुधि है मोर ॥४६॥* 
संतों के प्रताप का अन्त कही नहीं होता उनका प्रताप अनन्त है वह सब प्रताप, तपस्या, प्रभाव, मैं कहने में असमर्थ हूं और नहीं कह सकता । जितनी मेरी बुद्घिज्ञान है उसके अनुसार सत्संग की कीर्ति का वर्णन किया ॥४६॥ 
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*‘‘रांमा’’ ऐसी जांणि करि, तिनको कीजै ध्यान ।* 
*साखी अगनित संत हैं, गिनत सु आवे ज्ञान ॥४७॥* 
रामू दासजी कते है कि संतों व सत्संग का प्रभाव समझकर उन संतों का ध्यान करो । सत्संग का महत्व बताने वाले-असंख्य संत हैं उनका ध्यान करने से ज्ञान की प्राप्ति होती है ॥४७॥ 
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*ग्यारह वर्ष विते दौनौ राजाओं के युद्ध की तैयारी*
*अब स्वामी की कथा सुनांऊं, जैसे भई सुतैसै गांऊं ।* 
*एकादस वर्ष ऐसैं ही जांहीं, पदम धराज्यू भारत ठांनी ॥४८॥* 
अब में रामूदास स्वामी दयालजी की कथा सुनाता हूं जिस प्रकार की घटना घटी उसको उसी रूप में गाता हूं सुनाता हूं । इस प्रकार दोनों राजाओं के ग्यारह वर्ष बीत गये । जैमल संतों को मानता और पदम सिंह देवी को मानता । इस बात पर दोनों राजाओं मैं लडाई की स्थिति उत्पन्न हो गई ॥४८॥
(क्रमशः)

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