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*ज्ञान ध्यान सब छाड़ दे, जप तप साधन जोग ।*
*दादू विरहा ले रहै, छाड़ सकल रस भोग ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ विरह का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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वैष्णव भक्तों की वेदान्तमत पर अथवा शाक्तमत पर उतनी श्रद्धा नहीं है । श्रीरामकृष्ण बलराम के पिता को उस प्रकार के संकीर्ण भाव को त्यागने का उपदेश कर रहे हैं ।
श्रीरामकृष्ण(बलराम के पिता आदि के प्रति) – जो भी धर्म हो, जो भी मत हो, सभी उसी एक ईश्वर को पुकार रहे हैं । इसलिए किसी धर्म अथवा मत के प्रति अश्रद्धा या घृणा नहीं करनी चाहिए । वेद उन्हें ही कह रहे हैं, सच्चिदानन्द ब्रह्म, भागवत आदि पुराण उन्हें ही कह रहे हैं, सच्चिदानन्द कृष्ण, और तन्त्र कह रहे हैं, सच्चिदानन्द शिव । वही एक सच्चिदानन्द हैं ।
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“वैष्णवों के अनेक सम्प्रदाय हैं । वेद जिन्हें ब्रह्म कहते हैं, वैष्णवों का एक दल उन्हें अलख-निरंजन कहता है । अलख अर्थात जिन्हें लक्ष्य नहीं किया जा सकता, इन्द्रियों द्वारा देखा नहीं जा सकता । वे कहते हैं, राधा व कृष्ण अलख के दो बुलबुले हैं ।
“वेदान्तमत में अवतार नहीं हैं । वेदान्तवादी कहते हैं, राम, कृष्ण –भी ये सच्चिदानन्दरूपी समुद्र की दो लहरें हैं ।
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“एक के अतिरिक्त दो तो नहीं हैं, चाहे जिस नाम से कोई ईश्वर को पुकारे, यदि वह पुकार हार्दिक हो तो वह उसके पास अवश्य ही पहुँचेगी । व्याकुलता रहनी चाहिए ।”
श्रीरामकृष्ण भाव में विभोर होकर भक्तों से ये सब बातें कह रहे हैं । अब प्रकृतिस्थ हुए हैं और कह रहे हैं, “तुम बलराम के पिता हो ?”
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सभी थोड़ी देर चुपचाप बैठे हैं, बलराम के वृद्ध पिता चुपचाप हरिनाम की माला जप रहे हैं ।
श्रीरामकृष्ण(मास्टर आदि के प्रति) –अच्छा, ये लोग इतना जप करते हैं, इतना तीर्थ करते हैं, फिर इनकी प्रगति क्यों नहीं होती ? मानो अठारह मास का इनका एक वर्ष होता है ।
“हरीश से कहा, ‘यदि व्याकुलता न रहे, तो फिर वाराणसी जाने की क्या आवश्यकता ? व्याकुलता रहने पर यहीं पर वाराणसी है ।”
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“इतना तीर्थ, इतना जप करते हैं, फिर भी कुछ क्यों नहीं होता ? व्याकुलता नहीं है । व्याकुल होकर उन्हें पुकारने पर वे दर्शन देते हैं ।”
“नाटक के प्रारम्भ में रंगभूमि पर बड़ी गड़बड़ी मची रहती है । उस समय श्रीकृष्ण का दर्शन नहीं होता । उसके बाद नारद ऋषि जिस समय व्याकुल होकर वृन्दावन में आकर वीणा बजाते हुए पुकारते हैं और कहते हैं, ‘प्राण हे, गोविन्द मम जीवन’-उस समय कृष्ण और ठहर नहीं सकते, गोपालों के साथ सामने आ जाते हैं ।”
(क्रमशः)

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