गुरुवार, 5 नवंबर 2020

शब्द का अंग २२ - १/५

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भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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(#श्रीदादूवाणी ~ शब्द का अंग २२ - १/५)
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*दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।*
*वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगतः ॥१॥*
*दादू शब्दैं बँध्या सब रहै, शब्दैं ही सब जाइ ।*
*शब्दैं ही सब ऊपजै, शब्दैं सबै समाइ ॥२॥*
सब ही पदार्थ शब्द से जुड़े हुए हैं । शब्द से ही पैदा होते हैं और उसी में समा जाते हैं । क्योंकि सब ही पदार्थों की प्रकृति शब्द है और ब्रह्म ही शब्द तत्त्व है । ब्रह्म तो शब्दातीत है, उससे विरुद्ध ब्रह्म शब्द तत्त्व कैसे हो सकता है, यह कहना ठीक नहीं है क्योंकि जितने भी विकार हैं वे अपनी प्रकृति से अन्वित ही प्रतीत होते हैं । अतः ब्रह्म को शब्दतत्त्व कहना अनुचित नहीं है जैसे घट कुण्डलादि जितने भी विकार हैं, वे अपनी प्रकृति मृत्सुवर्ण आदि से अन्वित ही प्रतीत हो रहे हैं । ऐसे ही रुपादि विषय भी शब्दरुपानुगत ही प्रतीत होते हैं । वाक्यपदीय में लिखा है कि-
कोई भी ऐसा अर्थ नहीं जो शब्दानुगत प्रतीत न होता हो । क्योंकि सारे पदार्थ और ज्ञान शब्दानुविद्ध(शब्द से जुड़े हुए) ही प्रतीत होते हैं । अतः सब की प्रकृति शब्दतत्त्वरूप ब्रह्म ही है । भिन्न भिन्न स्वरूप और भिन्न भिन्न इन्द्रिय ग्राह्यरुपादि पदार्थ का अभिन्न रूप तथा अभिन्न इन्द्रिय ग्राह्यत्व कैसे संभव होगा और उनमें शब्द प्रकृतिकत्व भी कैसे बनेगा ? क्योंकि उपादान और उपादेय का सारुप्य ही अभीष्ट है । ऐसी शंका मन में नहीं लानी चाहिये क्योंकि रुपादि पदार्थों में जो भिन्नरूपता दीखती है यह अविद्याजन्य है । क्योंकि श्रुति में कहा है कि- मिट्टी सुवर्ण आदि ही सत्य है बाकी तो नामधेय वाणी का विकार मात्र है । प्रकृति ही सत्य है, कृति नहीं । किंच शब्द से वस्तु का परिच्छेद होता है । जैसे यह घट, यह पट है । अतः प्रकृति विकृति भाव से सब वस्तु शब्दात्मक ही है । यदि घटपटादि अर्थ शब्दस्वरूप नहीं होता तो शब्द से उसकी प्रतीति नहीं होनी चाहिये । किंवा, शब्द से अर्थ प्रतीत होता है । अतः शब्द प्रकृति होने से अर्थ शब्द रूप ही है । यह भी है कि शब्द से विषय विशिष्ट का ही ज्ञान होता है । जैसे मेरे को घट का ज्ञान है । अन्य से अन्य का ज्ञान नहीं हो सकता इससे यह सिद्ध हो गया कि अर्थ और ज्ञान शब्दात्मक है ।
स्थिति, प्रवृत्ति, निवृत्तिरूप व्यापार शब्द से ही होता है । अतः सब व्यवहार और विषय का मूलभूत ब्रह्म शब्दात्मक है । अतः ब्रह्म को शब्द तत्त्व कहने में कोई आपत्ति नहीं है । अतः यह मानना होगा कि शब्द तत्त्व ही रुपादिरूप से विवर्तित हो रहा है ।
वाक्यपदीय में लिखा है कि- जो आदि और विनाश रहित ब्रह्म है वह ही शब्द तत्त्व है और अक्षर है और शब्द तत्त्व ही अर्थभाव से विवर्तित हो रहा है । जिस शब्द से जगत् का व्यवहार होता है । अर्थात् स्थूल ककारादि वर्णाकार से ब्रह्म ही रुपादि ज्ञान के रूप में विवर्तित होता है । इसीलिये उसको अक्षर कहते हैं । जो स्वरूप से अप्रच्युत होता हुआ अर्थरूप से प्रतीत होता है उसको विवर्त कहते हैं । इसी अभिप्राय को लेकर महर्षि श्री दादूजी महाराज लिखा रहे हैं कि “शब्दै बन्ध्या सब रहै” इति ।
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*दादू शब्दैं ही सचु पाइये, शब्दैं ही संतोंख ।*
*शब्दैं ही सुस्थिर भया, शब्दैं भागा शोक ॥३॥*
शमदमादि साधनसंपन्न साधक “तत्वमसि” आदि महावाक्यजन्य ज्ञान के द्वारा ब्रह्म प्राप्त करता है । वैराग्यादि को बोधन कराने वाले शब्दों के श्रवण से ही मन की स्थिरता से सुख संतोष की प्राप्ति तथा शोक की निवृत्ति करता है ।
लिखा है कि- वैराग्यवान् मनुष्य को ऐसे शब्दों को सुनकर आनन्द आता है । जैसे पृथ्वी ही शय्या है सोने के लिये, भुजलता ही तकिया है, आकाश ही वितान है । चन्द्रमा दीपक, तथा वैराग्यरूपी स्त्री, दिशारूपी कन्याओं के पंखे की अनुभूति हवा से पूर्ण योगी भिक्षुक राजा की तरह सुख से सोता है ।
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*दादू शब्दैं ही सूक्ष्म भया, शब्दैं सहज समान ।*
*शब्दैं ही निर्गुण मिले, शब्दैं निर्मल ज्ञान ॥४॥*
शब्द अचिन्त्य महिमासंपन्न होता है । शब्द से ही आत्यन्तिक दुःख की निवृत्ति मानी गई है । यह शब्द ही सद्गुरु के मुख से निकल कर साधक के चित्त में जो अज्ञानरूपी अन्धकार है उसको दूर करता है । अतः शब्द परलोक कल्याणकारी है ।
महाभाष्य में लिखा है कि- एक ही शब्द को अच्छी तरह जान कर उसका सम्यक् प्रयोग करने पर स्वर्गलोक में यथेच्छ फल पाता है । एक ही शब्द ब्रह्म को जान लेने से सब कुछ जाना जाता है । जिससे साधक के चित्त में संतोष होता है कि मैंने सब कुछ जान लिया ।
लिखा है कि- ज्ञान न होने से पहले हमने कमलनयनी स्त्रियों के चंचल कटाक्षों से आकर्षित होते हुए अपनी यौवनश्री के द्वारा हृदय को पूजित किया । अर्थात् अपने हृदयगत भावों को पूर्ण किया । लेकिन जब से हृदय में सद् असद् का बोध जागृत हुआ तब से प्रत्याहार द्वारा हृदय को पवित्र किया तथा अब उसमें विशद् भाव जागते रहते हैं । इसी अभिप्राय से श्री दादूजी ने भी लिखा है कि वैराग्यपूर्ण शब्दों को सुनकर अतिसूक्ष्म ब्रह्म तत्त्व को प्राप्त करके समत्व भाव से निर्मल बुद्धि के द्वारा ब्रह्म में सदा रमता रहता है ।
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*दादू शब्दैं ही मुक्ता भया, शब्दैं समझे प्राण ।*
*शब्दैं ही सूझे सबै, शब्दैं सुरझे जाण ॥५॥*
हे जीव, तू शुद्ध बुद्ध स्वभाव वाला है इत्यादि मुक्तिबोधक शब्दों से साधक मुक्त हो जाता है । शब्दों से सब व्यवहार का ज्ञान होता है और सत्यासत्य निर्णायक वाक्यों से सत्य का निश्चय करके बन्धनों से निवृत्त होकर व्यवहारातीत दशा को प्राप्त हो जाता है ।
लिखा है कि- जिसने अपने भेद को नष्ट कर दिया तथा जिसके पुण्यपाप मायामोह क्षीण हो गये हैं ऐसा साधक संदेहवृत्ति के नष्ट हो जाने से वह शब्दातीत गुणातीत तत्त्व को जानकर ब्रह्म में विचरण करता है । विधि निषेध से भी अतीत हो जाता है ।
(क्रमशः)

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