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*मारणहारा रहि गया, जिहिं लागी सो नांहि ।*
*कबहूँ सो दिन होइगा, यहु मेरे मन मांहि ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ विरह का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*ईश्वर ही कर्ता*
“फिर कभी वे दिखाते हैं कि उन्होंने इस जीव-जगत् को बनाया है- जैसे मालिक और उसका बगीचा । “वे कर्ता हैं और उन्हीं का यह सब जीव-जगत् है, इसी का नाम है ज्ञान । और ‘मैं’ करनेवाला हूँ’, ‘मैं गुरु हूँ’, ‘मैं पिता हूँ’, इसी का नाम है अज्ञान । फिर मेरे हैं ये सब घर-द्वार, परिवार, धन, जन, आदि – इसी का नाम है अज्ञान ।”
बलराम के पिता- जी हाँ ।
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श्रीरामकृष्ण- जब तक यह बुद्धि नहीं होती कि ‘ईश्वर, तुम्हीं करता हो’ तब तक बारम्बार लौटकर आना ही होगा, बारम्बार जन्म लेना पड़ेगा । फिर जब यह ज्ञान हो जाएगा कि तुम्हीं कर्ता हो, तब जन्म नहीं होगा ।
“जब तक ‘तू ही, तू ही’ न करोगे तब तक छुटकारा नहीं । आना-जाना, पुनर्जन्म होगा ही-मुक्ति न होगी । और ‘मेरा मेरा’ कहने से भी क्या होगा ? बाबू का मुनीम कहता है, ‘यह हमारा बगीचा है, हमारी खाट, हमारी कुर्सी है ।’ परन्तु बाबू जब उसे नौकरी से निकाल देते हैं तो अपनी ऍम की लड़की की छोटीसी सन्दूकची तक ले जाने का उसे अधिकार नहीं रहता ।
“मैं और मेरा’ ने सत्य को छिपा रखा है- जानने नहीं देता !
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*अद्वैतज्ञान तथा चैतन्यदर्शन*
“अद्वैत का ज्ञान हुए बिना चैतन्य का दर्शन नहीं होता । चैतन्य का दर्शन होने पर सब नित्यानन्द होता है । परमहंसस्थिति में यही नित्यानन्द है ।
“वेदान्तमत में अवतार नहीं है । इस मत में चैतन्यदेव अद्वैत के एक बुलबुला हैं ।
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“चैतन्य का दर्शन कैसा ? दियासलाई जलाने से अँधेरे कमरे में जिस प्रकार एकाएक रोशनी हो जाती है भक्तिमत में अवतार मानते हैं । कर्ताभजा सम्प्रदाय की एक स्त्री मेरी स्थिति को देखकर कह गयी, ‘बाबा, भीतर वस्तुप्राप्ति हुई है उतना नाचना-कूदना नहीं, अंगूर के फल को रुई पर यत्न से रखना होता है । पेट में बच्चा होने पर सास अपनी बहू का धीरे धीरे काम बन्द करा देती है । भगवान् के दर्शन का लक्षण है, धीरे धीरे कर्म त्याग होना । यह मनुष्य(श्रीरामकृष्ण) ‘नर रत्न’ है ।’
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“मेरे खाते समय वह कहती थी, ‘बाबा, तुम खा रहे हो या किसी को खिला रहे हो ?
“इस ‘अहं’ ज्ञान ने ही आवरण बनाकर रखा है । नरेंद्र ने कहा था, यह ‘मैं’ जितना जाएगा, ‘उनका मैं’ उतना ही आएगा केदार कहता है, घड़े के भीतर जितनी अधिक मिट्टी रहेगी” अन्दर उतना ही जल कम रहेगा ।
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“कृष्ण ने अर्जुन से कहा था, ‘भाई, अष्टसिद्धियों में से एक भी सिद्धि के रहते तक मुझे न पाओगे । उससे थोडीसी शक्ति अवश्य मिल जाती है, पर बस केवल इतना ही । गुटिकासिद्धि, झाड़-फूक, दवा देना इत्यादि से लोगों का कुछ थोड़ा-बहुत उपकार भर हो जाता है, क्यों है न यही ?
“इसीलिए माँ से मैंने केवल शुद्ध भक्ति माँगी थी । सिद्धि नहीं माँगी ।”
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बलराम के पिता, वेणी पाल, मास्टर, मणि मल्लिक आदि से यह बात कहते कहते श्रीरामकृष्ण समाधिमग्न हो गए । बाह्यज्ञानशून्य होकर चित्र की तरह बैठे हैं ।
समाधि भंग हो जाने के बाद श्रीरामकृष्ण गाना गा रहे हैं-
(भावार्थ) – “सखि ! जिसके लिए पागल बनी उसे कहाँ पा सकी ?”
अब आपने रामलाल से गाना गाने के लिए कहा । वे गा रहे हैं । पहले ही गौरांग का संन्यास-
(भावार्थ) – “केशवभारती की कुटिया में मैंने क्या देखा-असाधारण ज्योतिवाली श्रीगौरांग की मूर्ति, जिसकी दोनों आँखों से शत धाराओं से प्रेमवारि बह रही है । गौर पागल हाथी की तरह प्रेम के आवेश में आकर नाचते हैं, गाते हैं; कभी भूमि पर लोटते हैं । आँसू बह रहे हैं । वे रोते हैं और हरिनाम उच्चारण करते हैं, उनका सिंह जैसा उच्च स्वर आकाश को भी भेद रहा है । फिर वे दाँतों में तिनका लेकर हाथ जोड़कर द्वार द्वार पर दास्यभाव द्वारा मुक्ति की प्रार्थना कर रहे हैं ।”
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चैतन्यदेव के इस ‘पागल’ प्रेमोन्माद-स्थिति के वर्णन के बाद श्रीरामकृष्ण के कहने पर रामलाल फिर गोपियों की उन्माद स्थिति का गाना गा रहे हैं-
(भावार्थ) – “रथचक्र को न पकड़ो, न पकड़ो, क्या रथ चक्र से चलता है ? उस चक्र के चक्री हरि हैं, जिसके चक्र से जगत् चलता है ।”
(भावार्थ) – “श्यामरुपी चन्द्र का दर्शन कर नवीन बादल की कहाँ गिनती है ? हाथ में बंसरी और ओठों पर मुस्कान लिये वह अपने रूप से जगत् को आलोकित कर रहा है ।”
(क्रमशः)

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