सोमवार, 2 नवंबर 2020

= *मूढ कर्मी असाध्य रोग का अंग १३०(१३/१६)* =

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*दादू कहि कहि मेरी जीभ रही, सुनि सुनि तेरे कान ।*
*सतगुरु बपुरा क्या करै, जो चेला मूढ़ अजान ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*मूढ कर्मी असाध्य रोग का अंग १३०*
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जे सुई सुरति के छीद्र व्है, तो तागा शब्द समाय ।
जन रज्जब नाके१ बिना, कहाँ परोवै२ जाय ॥१३॥
यदि सुई में छेद हो तो तागा उसमें जाता है, प्रवेश के मार्ग१ बिना तागा किसमें पिरोया२ जाय ? वैसे ही वृति में जिज्ञासा हो तो शब्द उसमें जाता है, जिज्ञासा बिना शब्द किसमें रक्खा जाय ? ठहरता ही नहीं ।
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ज्ञानी गाफिल१ व्है चलै, पग मग२ बाहिर देय ।
तो रज्जब जानत जड़३ हिं, कहि४ धौं५ कहि६ क्या लेय ॥१४॥
परमार्थ मार्ग२ से बाहर व्यवहार पथ में पैर रख कर चलता है तब ज्ञानी भी बेसुध१ हो जाता है अर्थात वृति ब्रह्माकार नहीं रहती, तो फिर जानते ही हो मूर्ख३ को कह४ करके निश्चय५ पूर्वक कहो६ उससे क्या यश लोगे ?
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ऊषर वैरी२ असंख्यक मण, कण निपजै कछु नाँहिं ।
त्यों रज्जब शठ शिषों सौं, हानि हुई गुरु माँहिं ॥१५॥
अन्न कण की वैरणि२ ऊषर भूमी में असंख्य मण अन्न कण बोने पर भी कुछ नहीं होता, बीज ही नष्ट होता है, वैसे ही दुर्जन शिष्यों को उपदेश देने से गुरु के भीतरी ज्ञान की हानि होती है, उन्हें ज्ञान नहीं होता ।
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साँभर के सर सारिखा१, शठ श्रोता का भाग ।
रज्जब तहाँ न नीपजै, भाव भक्ति का बाग ॥१६॥
दुर्जन श्रोता का भाग्य साँभर के सरोवर के समान१ है, जैसे साँभर के सरोवर में बाग नहीं लगता, वैसे ही दुर्जन के हृदय में भाव भक्ति उत्पन्न नहीं होती ।
(क्रमशः)

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