मंगलवार, 3 नवंबर 2020

*८. लै कौ अंग ~ ५३/५६*

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*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*८. लै कौ अंग ~ ५३/५६*
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बिलै मान तन तेज मंहि, कब करि हो करतार ।
कहि जगजीवन प्रगट हरि, सम्रथ सिरजनहार ॥५३॥
संतजगजीवन जी महाराज कहते हैं कि अपनी देह के गुण धर्म सभी प्रभु के तेज को समर्पित करे । ना जाने कब वे समर्थ सिरजनहार प्रकट हो जायें तुम्हारा उद्धार हो जाये । अपनी तैयारी पूरी रखे़ं ।
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कहि जगजीवन सकल कह, रांम गरीबनिवाज५ ।
दीन लीन ह्वै ताहि रटै, रसि आवै६ सब काज ॥५४॥
(५. गरीबनिवाज=दीनदयालु) (६. रसि आवै=पूर्ण हों)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो दीन होकर परमात्मा का स्मरण करते हैं सभी कहते हैं कि दीनों की रक्षा करनेवाले उन प्रभु की कृपा से सभी कार्य मनोरथ पूर्ण होते हैं ।
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ल्यौ लेखनि७ दिल द्वात करि, काया कागज सार । 
कहि जगजीवन नांम लिखि, हरि भजि उतरै पार ॥५५॥
(७. ल्यौ लेखनि दिल द्वात करि=लय को लेखनि और दिल को दवात बनाकर)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि लै की लेखनी करे दिल की दवात और देह को कागज करे । इस पर प्रभु का नाम लिखकर जीव भव से पार उतरते हैं ।
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पलटै भृंगी कीट ज्यूं, ल्यौ लगाइ गुण गाइ । 
जगजीवन पारस परस, लोहा कंचन थाइ८ ॥५६॥
(८. थाइ=हो जाता है)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जैसे भृंगी, कीट को अपना स्वरूप दे देता है । वैसे ही प्रभु से लय लगाने पर प्रभु जीव को अपना कर लेते हैं, जैसे लोहा पारस के स्पर्श से स्वर्ण हो जाता है ।
(क्रमशः)

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