बुधवार, 4 नवंबर 2020

= *मूढ कर्मी असाध्य रोग का अंग १३०(२१/२४)* =

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*दादू दूध पिलाइये, विषहर विष कर लेइ ।*
*गुण का औगुण कर लिया, ताही को दुख देइ ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*मूढ कर्मी असाध्य रोग का अंग १३०*
रज्जब गुरु वर१ बहु मिलै, वेश्या विधि भई साँझ । 
साँई२ सुत उपजै नहीं, जे बुधि३ वामा४ बाँझ ॥२१॥ 
सांयकाल होने के बाद वैश्या को बहुत पुरुष१ मिलते हैं किन्तु वह नारी४ वंध्या हो तो उसके पुत्र उत्पन्न नहीं होता । वैसे ही अज्ञानावस्था में बहुत से गुरु मिलते हैं किन्तु यदि बुद्धि३ साधन शून्य हो तो उसमें ब्रह्म२ का ज्ञान उत्पन्न नहीं होता । 
मीन माग१ जल में करै, सलिल२ हि रहै न संधि । 
त्यों रज्जब शठ शब्द सुन, पीछे रहै न बंध ॥२२॥ 
मच्छी जल में मार्ग१ कर देती है किन्तु जल२ में तो उसकी संधि भी नहीं रहती, वैसे ही गुरु के शब्द सुनने पर भी दुर्जन में वे शब्द पिछे बंध नहीं रहते अर्थात वह उन्हें याद रख कर उसके अनुसार व्यवहार नहीं बनता । 
रज्जब पावन कथा सुन, पामर बेधै नाँहिं । 
शोधे संधि न पाइये, ज्यों सर्प गया थल माँहिं ॥२३॥ 
पृथ्वी में घुसने वाला सर्प जब पृथ्वी में घुस जाता है तब खोजने पर भी उसकी संधि पृथ्वी में नहीं मिलती वैसे ही पवित्र कथा सुनने पर भी पामर नर का हृदय विद्ध नहीं होता । 
नींब हिं सीचै दूध सौं, नाग हि दे पय१ पान । 
रज्जब विष परि बिष भर्या, नींबही कड़वा जान ॥२४॥ 
नीम को दूध से सींचे तो वह दूध उसका कड़वापन ही बढायेगा । सर्प को दूध१ पिलाया जाय तो उसके विष पर विष ही भरा जायगा अर्थात दूध विष ही बढायेगा । वैसे ही दुर्जन को जान, उसे ज्ञान देने से वह ज्ञान भी उसकी दुर्जनता ही बढायेगा ।
(क्रमशः)

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