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*#श्रीदादू०अनुभव०वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग भैरूँ २४(गायन समय प्रात:काल)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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३९८ - (गुजराती) *अनन्य शरण* । उदीक्षण ताल
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माहरूँ१ सूँ२ जेहूं आपूँ३,
ताहरूँ४ छै तूनें थापूँ५ ॥टेक॥
सर्व जीव नें तूँ दातार,
तैं सिरज्या नें तू प्रतिपाल ॥१॥
तन धन ताहरो तैं दीधो६,
हूं ताहरो नें तैं कीधो७ ॥२॥
सहुवे८ ताहरो साचौ ये,
मैं मैं माहरो झूठौ ते ॥३॥
दादू नें मन और न आये,
तूँ कर्ता नें तूँ हि जु भावे ॥४॥
अनन्य शरण का परिचय दे रहे हैं - मेरा१ क्या२ है ? जो मैं आपको दूँ३, आपका४ ही सब कुछ है ।
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अत: आपको ही समर्पण५ करता हूं । सब जीवों को आप ही देने वाले हैं । आपने ही सबको उत्पन्न किया है और आप ही सबके पालने वाले हैं ।
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ये तन धनादि आप के ही हैं, आपने ही दिये६ हैं । मैं भी आपका ही हूं क्योंकि आपका ही रचा७ हुआ हूं । सत्य तो यही है कि सब८ कुछ आपका ही है, मैं और मेरापन जो है, वह सब मिथ्या है ।
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मेरे मन में तो अन्य कोई कर्ता है, यह विचार आता ही नहीं । आप ही कर्ता हैं और आप ही मुझे प्रिय हैं ।
(क्रमशः)

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