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🌷 *#०दृष्टान्त०सुधा०सिन्धु* 🌷
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*सकल भुवन सब आत्मा, निर्विष कर हरि लेइ ।*
*पड़दा है सो दूर कर, कश्मल रहण न देइ ॥*
*तन मन निर्मल आत्मा, सब काहू की होइ ।*
*दादू विषय विकार की, बात न बूझै कोइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ बिनती का अंग)*
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साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*#०दृष्टान्त०सुधा०सिन्धु*, *अन्याय*
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एक राजा ने प्यास से व्याकुल हो एक अनार के बाग में जाकर माली से जल मांगा । माली ने उसे भला मनुष्य जान करके दो अनार का पानी निकाल कर कटोरा भर कर उसे दिया ।
राजा ने पूछा - यह कितने अनार का है ।
माली - दो का ।
राजा के मन में लोभ आया कि - यह बाग तो मेरे लायक है अथवा इस पर कर अधिक लगना चाहिये । राजा ने दो तीन घंटे बाद फिर अनार का रस मांगा । अब के माली को लाने के देर होती देखकर राजा ने पुछा - देर कैसे हुई ?
माली - ज्ञात होता है राजा की नीति खराब हो गई है इसलिये अनारों का रस सूख गया है । बहुत अनारों का निकाला इसलिये देर हो गई ।
राजा समझ गया कि मेरा दुर्भावना का ही प्रभाव पड़ा है । अपना मन अच्छा करके फिर मँगवाया तो पूर्ववत ही दो से ही कटोरा भर गया ।
राजा के अन्याय का, जड़ पर पड़त प्रभाव ।
सूखा अनार जल तुरत, नृप का बदलत भाव ॥१३७॥

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