बुधवार, 18 नवंबर 2020

शब्द का अंग २२ - २४/२८

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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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(#श्रीदादूवाणी ~ शब्द का अंग २२ - २४/२८)
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*शब्द सरोवर सुभर भर्‍या, हरि जल निर्मल नीर ।*
*दादू पीवै प्रीति सौं, तिन के अखिल शरीर ॥२४॥*
सन्तों के शब्द ही सुन्दर जलाशय है । उसमें निर्मल ब्रह्म ज्ञान रूपी जल भरा हुआ है । कोई साधक ब्रह्मरुपी जल को पीता है तो उसकी दृष्टि में सारे शरीर ही ब्रह्म रूप से भासित होते हैं और अन्त में ब्रह्म में ही लीन हो जाते हैं ।
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*शब्दों मांहिं राम-रस, साधों भर दीया ।*
*आदि अंत सब संत मिलि, यों दादू पीया ॥२५॥*
महापुरुषों के शब्द राम रस से पूर्ण भरे हुए होते हैं । साधक जन उन शब्दों को विचार विचार कर सृष्टि के आरम्भ से प्रलय पर्यन्त उसका पान करते हुए मुक्त हो जाते हैं ।
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॥ गुरुमुख कसौटी ॥
कारज को सीझै नहीं, मीठा बोलै बीर ।
दादू साचे शब्द बिन, कटै न तन की पीर ॥२६॥
ब्रह्मबोधक शब्दों के बिना साधक का देहाध्यासरूप कष्ट दूर नहीं होता । किन्तु महापुरुषों के वैराग्य प्रधान वचनों से ही काम क्रोधादिकों का नाश हो सकता है । यद्यपि महापुरुषों के वचन आपात कटु लगते हैं तथापि वे औषध के समान दोषों को दूर करने में समर्थ होते हैं । अतः उनको औषध के समान पान करना चाहिये । केवल कानों को मीठे लगने वाले मधुर शब्दों से न तो दोष दूर ही होते और न मुक्ति ही मिलती ।
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*॥ सबद ॥*
*दादू गुण तजि निर्गुण बोलिये, तेता बोल अबोल ।*
*गुण गहि आपा बोलिये, तेता कहिये बोल ॥२७॥*
अहंकार आदि आसुर गुणों से रहित निष्पक्ष ब्रह्म बोधक जो वचन होते हैं वही वचन सद् वचन होते हैं । क्योंकि ऐसे वचनों से किसी की आत्मा को कष्ट नहीं होता । किन्तु जो अहंकार के साथ पक्षपातपूर्ण वचन बोले जाते हैं वे दूसरों के लिये कष्टप्रद होने से व्यंग कहलाते हैं सद् वचन नहीं । सद् वचन तो मौन की तरह सब को सुख देने वाले होते हैं ।
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*साचा शब्द कबीर का, मीठा लागै मोहि ।*
*दादू सुनतां परम सुख, केता आनन्द होहि ॥२८॥*
महात्मा कबीर के वचन मुझे बहुत ही अच्छे लगते हैं । क्योंकि वे अहंकार रहित तथा निर्गुण ब्रह्म के बोधक हैं । अतः परम सुख को देने वाले हैं । उनका बार बार विचार और श्रवण करने से महान् आनन्द मिलता है ।
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॥ इति शब्द के अंग का पं. आत्माराम साधु कृत भाषानुवाद समाप्त ॥२२॥ 
(क्रमशः)

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