बुधवार, 18 नवंबर 2020

(“पंचमोल्लास” ७०/७२)

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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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(“पंचमोल्लास” ७०/७२)
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*श्री दादूजी देवी के मंदिर में*
*पदमसिंघ लग्यो तहां सेवा,*
*स्वामी आये, लह्या न भेवा ।* 
*सूधे चले मंदिर मैं जाऊ,*
*गये पसरि साम्हों करि पांऊं ॥७०॥* 
पदमसिंघ वहां देवी की सेवा में लगा था उसने स्वामीजी को आने का भेद नहीं पाया । स्वामी सीधे मंदिर में गये और देवी के सामने पैर करके सो गये, पसर गये ॥७०॥ 
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*पदमसिंघ राजा ने देखा यह कौन है*
*बोले राव ‘‘कौन यहु भाई,*
*दीजै सज्या भागि नहीं जाई’’ ।* 
*द्वय बुलाये, आये च्यारी,*
*तेजवंत हो दीनी गारी ॥७१॥* 
राव ने कहा भाई यह कौन है इसको देवी का अपमान करने की सजा दण्ड दो भाग न जावे । उसने दो सेवकों को बुलाया और चार सेवक आये और राव ने गुस्से क्रोध से गाली दी ॥७१ ॥

*श्री दादूजी के स्वरूप बड़ते गये*
*झटकि जु कर सों बाहरि काढा,*
*दूजा और पर्यो तहां आड़ा ।* 
*दूजौ पकरि जू बारैं निकारी,*
*आगे पीछे भये जु चारी ॥७२॥* 
सेवकों ने हाथ पकड़ कर झटक कर मंदिर से बाहर निकाला तो वहां और स्वरूप आड़े पड़े थे । दूसरों को भी पकड़ कर मंदिर के बाहर निकाला तो आगे पीछे और वहां दुगने पसरे दिखाई दिये ॥७२॥ 
(क्रमशः)

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