बुधवार, 18 नवंबर 2020

*गृहस्थों के प्रति उपदेश*

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*फल पाका बेली तजी, छिटकाया मुख मांहि ।*
*सांई अपना कर लिया, सो फिर ऊगै नांहि ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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(२)
*गृहस्थों के प्रति उपदेश* 
ब्राह्मभक्त-मण्डली को सम्बोधित करके श्रीरामकृष्ण ने कहा-“निर्लिप्त होकर संसार में रहना कठिन है । प्रताप ने कहा था, ‘महाराज, हमारा वह मत है जो राजर्षि जनक का था; जनक निर्लिप्त होकर संसार में रहते थे, वैसा ही हम लोग भी करेंगे ।’ मैंने कहा, ‘सोचने ही से क्या कोई जनक हो सकता है? राजर्षि जनक को कितनी तपस्या करने के बाद ज्ञानलाभ हुआ था ! नतमस्तक और ऊर्ध्वपद होकर उग्र तपस्या में कितना काल व्यतीत करने के बाद वे संसार में लौटे थे !’
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“परन्तु क्या संसारियों के लिए उपाय नहीं है ? – हाँ, अवश्य है । कुछ दिन एकान्त में साधना करनी पड़ती है, तब भक्ति होती है, तब ज्ञान होता है, इसके बाद जाकर संसार में रहो, फिर कोई दोष नहीं । जब निर्जन में साधना करोगे, उस समय संसार से बिलकुल अलग रहो; तब स्त्री, पुत्र, कन्या, माता, पिता, भाई, बहन, आत्मीय, कुटुम्ब कोई भी पास न रहे; निर्जन में साधना करते समय सोचो, हमारे कोई नहीं हैं, ईश्वर ही हमारे सर्वस्व हैं । और रो-रोकर उनके पास ज्ञान और भक्ति की प्रार्थना करो ।
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“यदि कहो, कितने दिन संसार छोड़कर निर्जन में रहें ? तो इसके लिए यदि एक दिन भी इस तरह रह सको तो वह अच्छा; तीन दिन रहो तो ओर अच्छा है; अथवा बारह दिन, महीनेभर तीन महीने, सालभर – जो जितने दिन रह सके । ज्ञान-भक्ति प्राप्त करके संसार में रहने से फिर अधिक भय नहीं रहता ।
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“हाथों में तेल लगाकर कटहल काटने से फिर हाथों में उसका दूध नहीं चिपकता । छुई-छुऔवल खेलो तो पार छू लेने से फिर डर नहीं रहता । एक बार पारस पत्थर को छूकर सोना बन जाओ, फिर हजार वर्ष तक मिट्टी के नीचे गड़े रहने पर भी जब मिट्टी से निकाले जाओगे, तो सोना का सोना ही रहोगे ।
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“मन दूध की तरह है । उस मन को अगर संसाररूपी जल में रखो तो दूध पानी से मिल जायगा; इसीलिए दूध को निर्जन में दही बनाकर उससे मक्खन निकाला जात है । जब निर्जन में साधना करके मनरूपी दूध से ज्ञानभक्ति-रूपी मक्खन निकाला गया, तब वह मक्खन अनायास ही संसार-रूपी पानी में रखा जा सकता है । वह मक्खन कभी संसार-रूपी जल से मिल नहीं सकता – संसार जल पर निर्लिप्त होकर उतराता रहता है ।”
(क्रमशः)

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