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*एक शब्द सब कुछ कह्या, सतगुरु सिष समझाइ ।*
*जहाँ लाया तहँ लागै नहीं, फिर फिर बूझै आइ ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*मूढ कर्मी असाध्य रोग का अंग १३०*
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यहु मन काठा३ कुलिश१ गति२, बहुत खेचरी४ ठाणि६ ।
रज्जब गैंडा व्है रह्या, मरे न बाइक५ बाणि ॥९॥
यह मन वज्र१ के समान२ कठोर३ है और बहुत दुर्जनता४ करता६ है, यह गैंडा बन रहा है, जैसे गैंडा बाण से नहीं मरता, वैसे ही यह भी वचनों५ से नहीं मरता ।
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संगति में सीझैं१ सभी, खेचर२ सीझै नाँहिं ।
जन रज्जब ज्यों करड़कू, गले३ न हांडी माँहिं ॥१०॥
अग्नि पर चढी हुई हँडिया में सब मूंग सीझ जाते हैं किन्तु करड़कू मूंग नहीं सीझता३, वैसे हि सत्संग में बैठकर सभी मुक्त१ हो जाते हैं किन्तु दुर्जन२ मुक्त नहीं होता ।
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श्रेष्ठ जु सभझै आप सौं, सुध१ बुध२ शब्द सुनाय ।
जन रज्जब खेचर३ विमुख, क्यों ही गह्या न जाय ॥११॥
शुद्ध१ बुद्धि२ वाला व्यक्ति जब शब्द सुनता है तब जो श्रेष्ठ होते हैं वे तो अपने आप समझ जाते हैं किन्तु हरि से विमुख दुर्जन३ की बुद्धि से वह शब्द किसी प्रकार भी ग्रहण नहीं किया जाता ।
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जैसे गोली गुमट१ परि, गहि डाल्यों गिर जाय ।
त्यों रज्जब बहरी२ सुरति, शब्द कहाँ ठहराय ॥१२॥
जैसे गोली हाथ में ग्रहण करके गुम्बद१ पर डालने से गिर जाती है, ठहरती नहीं, वैसे ही बहिर्मुखी२ व वधिर वृति में शब्द कहाँ ठहरता है ?
(क्रमशः)

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