रविवार, 8 नवंबर 2020

शब्द का अंग २२ - १३/१६

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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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(#श्रीदादूवाणी ~ शब्द का अंग २२ - १३/१६)
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*॥ ईश्‍वर समर्थाई ॥*
*दादू एक शब्द सौं ऊनवै, वर्षन लागै आइ ।*
*एक शब्द सौं बीखरै, आप आपको जाइ ॥१३॥*
ईश्वर की आज्ञा रूप शब्द से मेघ आकाश में स्थित होकर वर्षा करने लगता है । तथा ईश्वर के निषेध करने पर आकाश में बादल छिन्न भिन्न हो जाता है । यह कार्यमात्र का उपलक्षण है । अर्थात् ईश्वर के विधि निषेधात्मक शब्दों से सारे जगत् का व्यवहार संपन्न होता है ।
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*दादू साधु शब्द सौं मिल रहै, मन राखै बिलमाइ ।*
*साधु शब्द बिन क्यों रहै, तब ही बीखर जाइ ॥१४॥*
साधुओं के सद्वचनों द्वारा अपने मन को परमात्मा में विलीन करना चाहिये । अन्यथा यह चंचल मन विषय विकारों में ही विचार के बिना दौड़ता रहेगा ।
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*दादू शब्द जरै सो मिल रहै, एक रस पूरा ।*
*कायर भाजै जीव ले, पग मांडै शूरा ॥१५॥*
जो साधक, साधुओं के शब्दों को विचार कर धारण करता है, वह एक रस रहने वाले ब्रह्म में लीन हो सकता है । उनके वचनों को जो साधक विचार नहीं करता तो उसका मन विषयों में ही रमण करता रहता है इसलिये साधु संगति करना चाहिये ।
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*शब्द विचारै करणी करै, राम नाम निज हिरदै धरै ।*
*काया मांहीं शोधै सार, दादू कहै लहै सो पार ॥१६॥*
सद्गुरु से उपदिष्ट ब्रह्मबोधक वाक्यों का बार बार मनन करना तथा तदनुसार आचरण करना, राम नाम का अपने हृदय में ध्यान करना तथा इसी शरीर के मध्य विश्व का जो सारभूत ब्रह्म स्थित है उसका अन्वेषण करना ये सब साधन, जिसके जीवन में आ गये हैं वह साधक संसार को पार करके ब्रह्म पद को प्राप्त कर लेता है । अध्यात्मरामायण में- जो तत्परता से साधु सेवा में अनन्य बुद्धि रखता हुआ मेरे भक्तों का निर्मल और शान्त विचार वाले योगियों का मेरी सेवा में अनुराग रखने वालों का तथा निर्मल ज्ञानियों का सदा ही संग करता है, तो उसको मोक्ष हस्तगत हो जाता है और मैं अहर्निश उस की दृष्टि का विषय बना रहता हूँ । दूसरे किसी भी उपायों से दर्शन नहीं दे सकता ।
(क्रमशः)

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