🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏🇮🇳 *卐सत्यराम सा卐* 🇮🇳🙏
🌷🙏🇮🇳 *#भक्तमाल* 🇮🇳🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*आपा गर्व गुमान तज, मद मत्सर अहंकार ।*
*गहै गरीबी बन्दगी, सेवा सिरजनहार ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ जीवित मृतक का अंग)*
=================
*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
.
*श्रमणानाम्नी शबरी(भिल्लनी) की पद्य टीका*
*आरन१ में शबरी भज है हरि,*
*संतन सेव कर्यो नित चावे ।*
*जान तिया तन न्यून किया कुल,*
*या हित तैं किन हूं न लखावे ॥*
*रेन रहै तुच्छ माग बुहारत,*
*आश्रम में लकरी धर पावे ।*
*गोप्प रहै ऋषि जानत नांहिं सु,*
*प्रात उठै सब आश्चर्ज पावे ॥३२॥*
शबरी भिल्ल जाति में उत्पन्न हुई थी, बालपन में ही इसकी स्थिति अन्य लोगों से विलक्षण थी, विवाह के समय भक्षण के लिये बहुत-से पशु एकत्र किये गये थे । उन्हें देखकर इसको दया आ गई । रात्रि में उन सब पशुओं को छोड़कर स्वयं भी पम्पासर पर छिप कर रहने लगी ।
.
वन१ में रह कर शबरी हरि भजन करती थी और नित्य संत-सेवा करने का भी उसमें उत्साह था किन्तु मेरे कर्मों ने मेरा कुल नीच तथा शरीर नारी का बनाया है, इस संकोच से सेवा करते हुये किसी की दृष्टि में नहीं आती थी, छिपकर के ही सेवा करती थी । थोड़ी रात्रि रह जाती थी तब मार्ग साफ कर आती थी, ऋषि आश्रम में समिधा तथा भोजन बनाने आदि के लिये लकड़ियाँ डाल आती थी । ये सब करते हुये भी गुप्त रहती थी । कोई भी ऋषि इनकी उक्त सेवा को नहीं जानता था, प्रातःकाल उठ करके देखते थे तब उन्हें बड़ा आश्चर्य होता था ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें