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*सतगुरु साधु सुजान है, शिष का गुण नहिं जाइ ।*
*दादू अमृत छाड़ कर, विषय हलाहल खाइ ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*मूढ कर्मी असाध्य रोग का अंग १३०*
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हिम गिरि पर तरु तरल१ व्हैं, बध्या न सुणिये कोय ।
तो रज्जब जड़ जीव में, कहु सुकृत क्यों होय ॥१७॥
हिमालय पर वृक्ष द्रव१ होकर नष्ट हो जाते हैं कोई भी बढा हुआ नहीं सुना जाता, तब कहो, जड़ जीव में सुकर्म के विचार दृढ कैसे होंगे ? वे तो क्षणभंगुर ही होंगे ।
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हिम गिरि पर पाषाण का, कोट१ हुआ नहिं कोय ।
यूं आज्ञा भंग अचेत२ उर, क्यों करे ज्ञान गढ़ कोय ॥१८॥
हिमालय पर्वत पर पत्थर का किला१ न तो आज तक बना और न बने ही गा, वैसे ही गुरु जनों की आज्ञा न मानने वाले मूर्ख२ के हृदय में कोई ज्ञान रूप किला कैसे तैयार करेगा ?
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शिल१ दिल पर जामै नहीं, भाव भक्ति का बीज ।
रज्जब फल क्यों पाइये, जे अन्तरिगत२ हीज ॥१९॥
जैसे शिला१ पर वृक्ष का बीज नहीं जमता, वैसे ही दुर्जन के हृदय में भाव भक्ति नहीं जमती, जो हिंजड़ा है उसे पुत्र कैसे प्राप्त होगा ? वैसे ही जिसके हृदय के भीतर२ साधन शक्ति नहीं है, उसे ज्ञान रूप फल कैसे मिलेगा ?
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आतम अबला१ बाँझड़ी२, सुकृत सुत नहिं वास ।
रज्जब ऊजड़३ उदर हूं, गुरु दाई कृत नाश४ ॥२०॥
वंध्या२ नारी१ के पेट में पुत्र का निवास नहीं होता । तब उसके शून्य३ पेट में दाई के कार्य का अभाव४ ही है, वहाँ दाई क्या करेगी ? वैसे ही जिस जीवात्मा के हृदय में सुकृत करने की भावना ही नहीं है तब वहां गुरु के कार्य का अभाव ही है, गुरु वहाँ क्या करेगा ?
(क्रमशः)

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