🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#०दृष्टान्त०सुधा०सिन्धु* 🌷
*मन ही सौं मन थिर भया, मन ही सौं मन लाइ ।*
*मन ही सौं मन मिल रह्या, दादू अनत न जाइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ मन का अंग)*
=================
साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
.
*#०दृष्टान्त०सुधा०सिन्धु*, *मन*
########################
संत भर्तृहरि एक नगर में हलवाई की दुकान पर हलवा देखकर हलवाई से बोले - मुझे हलवा दे । हलवाई - पैसे लाओ । भर्तृहरि - पैसे तो नहीं है । हलवाई - तब हलवा नहीं मिलेगा । भर्तृहरि - पैसे कहां मिलेंगे । हलवाई - गांव के दक्षिण की ओर एक तालाब खुद रहा है वहां जाकर काम करो तो पैसा मिलेगा ।
.
भर्तृहरि का मन नहीं रुका, वे तालाब पर जाकर दिन भर टोकरियां ढोते रहे । सांझ को उन्हें पैसे मिले, पैसे लेकर हलवाई के पास आये, हलवा लिया और बोले यहां कोई जलाशय है ? हलवाई - गांव की उत्तर की ओर तालाब भरा है ।
.
भर्तृहरि तालाब की ओर चले जाते थे तथा सोचते जाते थे कि आज तो मन ने मुझे बहुत हैरान किया । इतने में ही मार्ग में एक भैंस का बड़ा पोठा पड़ा था उसे उठा लिया और तालाब पर जा घाट पर बैठकर गोबर का बड़ा ग्रास बना कर मुख में डाले ओर हलवे का ग्रास तालाब में मच्छियों को डाल दें ।
.
इसी प्रकार सब गोबर आप खा गये एक ग्रास हलवे का बचा तब मन मानों मूर्ति धार कर कहता है कि एक ग्रास तो दे दो किंतु भर्तहरि ने नहीं दिया । ऐसे जो करता है वह अवश्य मन को जीत लेता है ।
तजे प्राप्त सो चित को, जीत सके सत भाव ।
भर्तृहरि ने विजय किया, हलवा डाल तलाव ॥२३॥

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें