बुधवार, 18 नवंबर 2020

= *मूढ कर्मी असाध्य रोग का अंग १३०(४१/४४)* =

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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*कोटि वर्ष लौं राखिये, पत्थर पानी मांहि ।*
*दादू आडा अंग है, भीतर भेदै नांहि ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*मूढ कर्मी असाध्य रोग का अंग १३०*
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गरक ज्ञान गहरै सु जल, आवख्य भरि न्हाय ।
पै रज्जब मन मीन की, दुरमति वास न जाय ॥४१॥
आयु भर गहरे जल में डूबी रहती है तो भी मच्छी की दुर्गध नष्ट नहीं होती, वैसे ही मूढ मन मानव आयु भर गहरे तीर्थ जल में स्नान करे तो भी उसकी दुर्बुध्दि नष्ट नहीं होती है ।
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आतम उर अज्ञान रत१, सुने न सदगुरु बात ।
पारस पोरस२ क्या करे, धरती खाई धात३ ॥४२॥
यदि लोह धातु३ को पृथ्वी खा जाय अर्थात काट लग कर खराब हो जाय तब पारस का सुवर्ण बनाने वाला पुरुषार्थ२ क्या करेगा ? वैसे ही मूढ जीवात्मा का अंत:करण अज्ञान में अनुरक्त१ रहता है, सदगुरु के वचन भी नहीं सुनता तब गुरु का पुरुषार्थ क्या करेगा ?
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हरि सा१ हितू२ विसारि करि, मुग्ध३ सु भूला मींच४ ।
रज्जब रोग असाध्य अति, क्यों नीका५ व्है नींच ॥४३॥
भगवान जैसे१ हितैषी२ को भूलकर मूर्ख३ मृत्यु४ को भी भूल गया है, ठीक है जिसे अज्ञान रूप असाध्य रोग लगा है, वह नींच प्राणी प्रभु प्राप्ति रूप आरोग्यता५ को कैसे प्राप्त कर सकता है ?
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रज्जब रोग असाध्य है, राग द्वेष जिव माँहिं ।
निकसे गुर गोविन्द सौं, नहिं तो निकसे नांहिं ॥४४॥
जीव के अंत:करण में राग द्वेष रूप असाध्य रोग लगा है, गुरु और गोविन्द कृपा करैं तो कंत:करण से राग-द्वेष निकल सकते है, नहीं कृपा करैं तो नहीं निकल सकते ।
(क्रमशः)

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