🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*#श्रीदादू०अनुभव०वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग भैरूँ २४(गायन समय प्रात:काल)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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४०४ - *अध्यात्म* । एकताल
मन पवन ले उनमन रहे,
अगम निगम मूल सो लहै ॥टेक॥
पँच वायु जे सहज समावै,
शशिहर के घर आँणै सूर ।
शीतल सदा मिलै सुखदाई,
अनहद शब्द बजावै तूर ॥१॥
बँकनालि१ सदा रस पीवै,
तब यहु मनवा कहीं न जाइ ।
विकसे कमल प्रेम जब उपजै,
ब्रह्म जीव की करै सहाइ ॥२॥
बैस गुफा मैं ज्योति विचारै,
तब तेहिं सूझै त्रिभुवन राइ ।
अंतर आप मिलै अविनाशी,
पद आनन्द काल नहिं खाइ ॥३॥
जामण मरण जाइ भव भाजै,
अवरण के घर वरण समाइ ।
दादू जाय मिलै जगजीवन,
तब यहु आवागवन विलाइ ॥४॥
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४०४ - ४०५ में अध्यात्म विषय कह रहे हैं -
जो साधन द्वारा प्रथम मन और प्राणों को अपने वश कर लेता है, वही समाधि में स्थिर रहता है और वेद से भी अगम ब्रह्म को प्राप्त करता है ।
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इड़ा नाड़ी रूप चन्द्र के वाम स्वर रूप घर में पिंगला नाड़ी रूप सूर्य को लाता है, फिर दोनों सुषुम्ना१ में लाकर, पँच प्राणों को सहजावस्था रूप समाधि में लीन करता है, तब सदा शीतल और सुखदायिनी अवस्था प्राप्त होती है और वहां रुका हुआ प्राण अनाहत नाद रूप नगाड़ा बजाने लगता है,
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तथा साधक सुषुम्ना के द्वारा सदा आनन्द - रस का पान करता है, तब यह मन उस स्थान को छोड़ कर कहीं भी नहीं जाता । इस प्रकार साधन से जब परम - प्रेम उत्पन्न होता है, तब हृदय - कमल खिल जाता है और ब्रह्म, जीव को अपनी ओर आगे बढ़ाने की सहायता करता है,
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फिर साधक भ्रमर गुफा में ध्यान रूप आसन लगा कर परब्रह्म ज्योति को देखते हुये विचार करता है, तब उसे त्रिभुवन के राजा परब्रह्म भासने लगते हैं और वह स्वयँ भीतर ही अविनाशी ब्रह्म में अभेदरूप से मिल जाता है, वह ब्रह्म पद आनन्द रूप है, उसमें स्थित को काल नहीं खाता,
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जन्मना - मरना दूर हो जाता है, साँसारिक भावनाएं हृदय से भाग जाती हैं । अवर्ण ब्रह्म के स्वरूप में वर्ण रूप जीव समा जाता है । इस प्रकार जब जीवात्मा जगजीवन ब्रह्म में जा मिलता है, तब यह आना जाना रूप सँसार उसका नष्ट हो जाता है ।
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(क्रमशः)

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