🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#०दृष्टान्त०सुधा०सिन्धु* 🌷
*साहिब जी का भावता, कोई करै कलि मांहि ।*
*मनसा वाचा कर्मना, दादू घटि घटि नांहि ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ निष्काम पतिव्रता का अंग)*
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साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*#०दृष्टान्त०सुधा०सिन्धु*, *आज्ञा*
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एक राजा अपने एक नौकर पर विशेष विश्वास और प्रेम रखता था । एक दिन मंत्री ने इसका कारण पूछा । राजा - कभी बताऊंगा । फिर एक दिन राजा ने अपनी रानी का नौलखा रत्नहार सभा में मंगवाकर, मंत्री आदि से पूछा - यह क्या है ? इसकी कीमत क्या होगी ? सबने कहा - यह नौलखा रत्नहार है । राजा मंत्री से बोले - इसे हमामदस्ते में डालकर तोड़ डालो ।
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मंत्री आदि सब ने कहा - महाराज ! यह तोड़ने लायक नहीं है कृपा करके इसे न तुड़वावे । फिर राजा ने अपने विश्वासी और प्यारे नौकर को बुलवाकर, उसके हाथ में रत्नहार देकर उससे भी उपर्युक्त प्रश्न किया, उसने भी उपर्युक्त उत्तर ही दिया । फिर राजा ने उसे भी कहा - इसको हमामदस्ते में डाल कर कूट डालो ।
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उसने वहां ही सबके सामने देखते देखते रत्नहार का चूर्ण बना दिया । फिर राजा बोले - अरे मूर्ख ! तूने यह क्या किया ? इस बहुमुल्य हार का चूर्ण करना योग्य था क्या ? नौकर - भगवन ! मुझ से भूल हुई है आप क्षमा करें ।
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यह सुनकर राजा मंत्री की ओर देखते हुए बोले - यही कारण है कि मेरा इस पर अधिक विश्वास और प्रेम है । यह कभी आज्ञा का उल्लंधन नही करता और आज्ञापालन में होने वाली हानि का दोष, यह कहकर कि मैं क्या करूं मैंने तो आपकी आज्ञानुसार ही किया था, स्वामी पर नहीं लगाता किंतु अपनी भूल मानता है । आप सब ने जिस रूप में रत्नहार को समझा था, उसी रूप में इसने भी समझा था इसने मूर्खता से नहीं तोड़ा है, यह सब आपको ज्ञात है । यह सुनकर मंत्री आदि चुप रहे कुछ न बोले ।
आज्ञा पालन हानि को, पालक कह निज दोष ।
नृप आज्ञा से हार हत, दिया न नृप को दोष ॥१११॥

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