रविवार, 8 नवंबर 2020

= *मूढ कर्मी असाध्य रोग का अंग १३०(२९/३२)* =

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*कोटि वर्ष लौं राखिये, बंसा चन्दन पास ।*
*दादू गुण लिये रहै, कदे न लागै बास ॥*
=================
*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
.
*मूढ कर्मी असाध्य रोग का अंग १३०*
.
शब्द सींदरी१ क्यों बंधै, जे काया कुंभ नहिं कान ।
रे रज्जब रार्यों२ बिना, कहा दिखावै भान३ ॥२९॥
यदि घड़े के बांधने योग्य मुख न हो तो रस्सी१ केसै बाँधी जाय ? वैसे ही यदि शरीर में कान नहीं अर्थात न सुने तब शब्द कैसे सुनाया जाय ? जिसके नेत्र२ न हों तो उसे सूर्य३ क्या दिखावे, वैसे ही जिसमें बुद्धि न हो गुरु उसे क्या दिखावे ?
.
बावन वास न वेधिया, मिश्री मिल्या न बंस ।
यूं न्यारा निज मंत१ में, मूढा वर्ष सहंस२ ॥३०॥
बावने चंदन की सुगंध से विद्ध होकर चंदन भी नहीं हुआ और मिश्री में भी नहीं मिला अर्थात बाँस की सींकों पर मिश्री जमाई गई तब वे सींके भी मिश्री में नहीं मिली, इस प्रकार बांस अपने आकार में सबसे अलग ही रहा । ऐसे ही मूढ अपने विचार१ में सहस्त्रों२ वर्षो तक सबसे अलग ही रहता है ।
.
रज्जब पुरुष पवंग१ को, कीजै शुद्ध उपाय ।
एक त्रिया रितु रंगनि२, इनकी चिकटि३ न जाय ॥३१॥
पुरुष और घोड़े १ को अंडकोश निकालने आदि उपाय से शुद्ध अर्थात काम
रहित किया जा सकता है किंतु एक तो ॠतु धर्म के पश्चात् प्रेमयुक्त२ नारी और दूसरी घोड़ी इनकी कामुक वृति रूप चिकनापन३ नहीं जाता ।
.
हनुमंत हाँक नर हीज१ ह्वै, परि नारि न ह्वै निष्काम ।
रज्जब पुरुष प्रमोधिये२, परि बोध न दीजे वाम३ ॥३२॥
सिंहल द्वीप में हनुमान की हाँक से नर तो नपुसंक१ हो जाते हैं किन्तु नारी काम रहित नहीं होती । अत: पुरुष को ही उपदेश२ देना चाहिये किन्तु नारी३ को ज्ञान नहीं दो ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें