🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*#श्रीदादू०अनुभव०वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग भैरूँ २४(गायन समय प्रात:काल)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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४०१ - *साधु* । भँगताल
काम क्रोध नहीं आवै मेरे,
तातैं गोविन्द पाया नेरे ॥टेक॥
भरम कर्म जाल सब दीन्हा,
रमता राम सबन में चीन्हा ॥१॥
दूविधा दूर्मति दूर गमाई,
राम रमत साची मन आई ॥२॥
नीच ऊंच मध्यम को नाँहीं,
देखूँ राम सबन के माँहीं ॥३॥
दादू साच सबन में सोई,
पेड१ पकर जन निर्भय होई ॥४॥
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अपनी सँतत्व रूप स्थिति बता रहे हैं - काम - क्रोध मेरे हृदय में नहीं आते, इसी से मैंने अति समीप हृदय में ही गोविन्द को प्राप्त किया है ।
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जब मैंने सँपूर्ण भ्रम और कर्म - जन्य सभी पाप ज्ञानाग्नि द्वारा जला दिये, तब ही विश्व में रमने वाले राम को सभी में पहचाना है ।
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दुविधा और दुर्मति जब हृदय से चली गई, तब ही राम के स्वरूप में रमण करने की सच्छी भावना मन में आई है ।
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अब नीच, ऊंच और मध्यम कोई भी नहीं भासता, सभी में राम को ही देखता हूं ।
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वह सत्य ब्रह्म सब में है । सबके मूल१ रूप भगवान् की शरण का मार्ग१ ग्रहण करके ही भक्त जन निर्भय होते हैं ।
(क्रमशः)

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