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*ये मन मेरा पीव सौं, औरनि सौं नाँहीं ।*
*पीव बिन पलहि न जीव सौं, यह उपजै मांहीं ॥*
*प्राणपति तहँ पाइया, जहँ उलट समाई ।*
*दादू पीव परचा भया, हियरे हित लाई ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ पद्यांश. ३५०)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*बूझत बूझत आय रहे जित,*
*राम सनेह भरे तित श्यौरी ।*
*आश्रम में तब जान लिये हरि,*
*अंग नवावत लावत त्यौरी ॥*
*आप उठे मिले भरि अंकन,*
*नैन ढरै जल प्रेम पग्योरी ।*
*बेरन खाय सराहत भोजन,*
*और कहूँ न सवाद लग्योरी ॥३७॥*
शबरी के प्रेम से पूर्ण हृदय रामजी वहां ही आ पहुँचे जहाँ शबरी थी । शबरी ने सब जान लिया कि- लक्ष्मण के साथ भगवान् राम आश्रम पर ही पधार गये हैं तब उनका एक टक दर्शन करते हुये साष्टांग प्रणाम करने लगी ।
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पृथ्वी पर साष्टांग करे देखकर भक्त-वत्सल भगवान् राम उसे उठाकर तथा अंक में भरकर के उससे मिले । उस समय प्रेम में ऐसे निमग्न हुए कि नेत्रों में प्रेमाश्रु की धार चलने लगी । भगवान् राम ने शबरी के बेरों का भोजन करते हुये कहा- ऐसे स्वादु बेर तो कहीं भी नहीं खाये थे ।
(क्रमशः)

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