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*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*९. निहकर्मी कौ अंग ~ ५/८*
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जगजीवन रमि रांम स्यूं, रांम चरण रुचि मांन ।
जुग जुग जीवै आतमां, लागि धणीं के ध्यांन९ ॥५॥
(९. लागि धणीं के ध्यांन=परमेश्वर परमात्मा के चिन्तन में लगे रहो)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि राम में चित लगा हो और राम चरणों में चित का अभिमान हो और इसी स्थिति में चित युगों तक सदैव लगा रहे और आत्मा उन मालिक का ध्यान धरे ।
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कहि जगजीवन रांमजी, उलट भिदै मन मांहि ।
तुम ही माता तुमहिं पिता, तुम बिन दूजा नांहि ॥६॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि है जीव सब उलट कर अंतर में रखें उसे संसार में बिखरने न दें । और मन प्रभु के प्रति यह भाव रहे कि हे प्रभु आप ही हमारे माता हो आप ही पिता हो आपके सिवाय अन्य कोइ नहीं है ।
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कहि जगजीवन रांमजी, सब क्रित मेरे नांम ।
करनी रहनी१ बिना हरि, सरै न२ कोई कांम ॥७॥
(१. करनी रहनी-कथन एवं व्यवहार) (२. सरै न=पूर्ण नहीं होता)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि मेरी सभी क्रियाओं का क्रियान्वयन चाहे वह रहना, कहना कुछ भी हो आपके बिना न हो आपके बिना मेरा कोइ काम न हो सभी की पूर्णताः आपसे ही हो ।
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जनम भूमि है हमारी, काया नगरी मांहि ।
जगजीवन माता-पिता, हरि बिन दूजा नांहि ॥८॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हम इस देह से ही अस्तित्व में आते हैं अतः यह देह ही हमारी जन्म भूमि है । प्रभु कै बिना हमारे कोइ माता पिता नहीं है हमारे सभी प्रभु ही है ।
(क्रमशः)

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