शनिवार, 7 नवंबर 2020

*दीरघ शोक वियोग-भयो गुरु*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏🇮🇳 *卐सत्यराम सा卐* 🇮🇳🙏
🌷🙏🇮🇳 *#भक्तमाल* 🇮🇳🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*गर्वै रसातल जाइये, गर्वै घोर अन्धार ।*
*गर्वै भौ-जल डूबिये, गर्वै वार न पार ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ पद्यांश. ४५)*
=================
*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,* 
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान* 
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
.
*दीरघ शोक वियोग-भयो गुरु,*
*राम मिलाप शरीर हि राखै ।*
*घाट बुहारत न्हावन को निशि,*
*बेर लगी ऋषि आवत पाखै१ ॥*
*लागि गयो तन क्रोध कर्यो बहू,*
*न्हान गयो शबरी पग नाखै२ ।*
*रक्त भयो जल मांहिं लटै लट,*
*नौतम सोच भयो सब भाखै ॥३५॥*
गुरुदेव के वियोग से शबरी को महान् शोक हुआ था किन्तु उसने रामजी से मिलने के लिये धैर्य पूर्वक शरीर रक्खा । वह प्रतिदिन रात्रि रहते ही ऋषियों के स्नान करने के घाट का मार्ग साफ करती थी किन्तु एक दिन कुछ देर हो जाने से पीछे१ से शबरी का प्रतिपक्षी कोई ऋषि आ गया, मार्ग संकुचित होने से उनके शरीर से शबरी का शरीर छुया गया । 
इस पर ऋषि ने बहुत क्रोध किया और शबरी को अपने पैर से एक ओर पटक२ कर पुनः स्नान करने गया । उसके जल में प्रवेश करते ही जल लाल हो गया और जल में लटैं ही लटैं हो गई । इससे सबने कहा- यह तो नवीन चिन्ता हो गई है । जल बिना तो बड़ा दुःख होगा । उन्होंने जल बिगड़ना भी शबरी का अपराध माना । 
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें