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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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(“पंचमोल्लास” ५८/६०)
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*दादूराम पुकारे सब कोई*
*कै सबहिन को आयो कालू,*
*नहीं तर छिन में करे निहालू ।*
*चहुं दिसा को मारग हेरे,*
*‘‘दादू’’ ‘‘दादू’’ अखंड जु टेरे ॥५८॥*
कठोर साधना के द्वारा या तो सब का काल आ गया है या यदि संत हृदय द्रवित हो गया तो क्षण भर में सबको निहाल कर देंगे । आशा पूर्ण कर देंगे । चारों दिशाओं के मार्ग में फिर फिर कर दादू-दादू ध्वनि का अखंड कीर्तन कर रहे हैं ॥५८॥
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*आमेर में दादू जी पुकार सुनी*
दादू दादू बोलौं वांणी,*
*बिन देखे नहीं पीजे पांणी ।
देश ढूंढाहड़, सहर आंबेरी,*
*ध्यांन सेन में सुनी जुटेरी ॥५९॥
संतों ने कहा ‘‘दादू’’ ‘‘दादू’’ की वाणी ध्वनि कीर्तन करो और बिना दादू के दर्शन किये पानी भी मत पीओ । ढूंढाहड़ देश में आमेर शहर है उसमें दादूजी ध्यानमग्न हैं । उन्होंने ध्यान में केदार देश के भक्तों की पुकार सुनी ॥५९॥
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*चार जाम में पहुंचे केदार देश*
*चले तहां सूं पर उपगारी,*
*चारि जाम महिं लिया संभारी ।*
*माघि चले जपैं अविनासी,*
*काटै जाई कर्म की पासी ॥६०॥*
परोपकार करने वाले संत दादूजी आमेर से केदार देस के लिये चले और चार पहर में ही उन्होंने अपने भक्तों को संभाल लिया । मार्ग में चलते हुये वे अविनासी ब्रह्म का जाप कर रहे थे और भक्तों के कर्म की फांसी काट रहे थे ॥६०॥
(क्रमशः)

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