बुधवार, 18 नवंबर 2020

*९. निहकर्मी कौ अंग ~ २१/२४*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*९. निहकर्मी कौ अंग ~ २१/२४*
पांच तीन पच्चीस बसि, रस मंहि राखै रांम ।
कहि जगजीवन सहज घर, निरभै निहचल ठांम ॥२१॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि पांच इन्द्रियों व उनके पच्चीस गुण की प्रवृत्ति व्याप्त होने पर भी प्रभु जीव पर दया कर उसे आनंद रस में रखते हैं वे उसे सहज ही अपनी शरण देकर निर्भय निश्चल करते हैं ।
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पांच तत्त हरि माहिं रहै, निराधार रस धार ।
कहि जगजीवन जन मिलै, वारि मिलै ज्यूं वार६ ॥२२॥
(६. वारि मिलै ज्यूं वार=जैसे जल में जल मिल जाता है) 
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो जीवात्मा अपने पांच गुणों सहित उस प्रभु में समाया रहता है, वह कोइ आधार न होते हुए भी राम रुपी रस में रहता है । संत कहते हैं वे ऐसे ही परमात्मा में समाये़ रहते हैं जैसे जल में जल समाया रहता है ।
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कहि जगजीवन रांमजी, दिल मंहि उभै अनंग७ ।
अविगत परस्यां८ एक रस, उस घर लागै रंग ॥२३॥
(७. अनंग=अंगरहित काम या कामना) {८. परस्यां=स्पर्श(साक्षात्कार) कर लेने पर}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि यदि मन में कामनाओं का वास हो तो भी एक प्रभु के स्पर्श मात्र से परमात्मा के रंग में रंग जाती है ।
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रांम हमारे भागवत९, रांम हमारे बेद ।
कहि जगजीवन रांम हमारे, तप तीरथ व्रत भेद ॥२४॥
(९. भागवत=भागवत महापुराण)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि राम ही हमारे भागवतपुराण हैं, राम ही हमारे वेद हैं, राम ही हमारे तप, तीर्थ, व्रत हैं । हमारे समग्र पुण्य राम ही हैं ।
(क्रमशः)

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