सोमवार, 9 नवंबर 2020

*९. निहकर्मी कौ अंग ~ १३/१६*

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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*९. निहकर्मी कौ अंग ~ १३/१६*
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जे आराधै रांमजी, चित७ र निरोधै सास७ ।
ते विचित्र चित मंहि बसे, सु कहि जगजीवनदास ॥१३॥
(७-७. चित र निरोधै सांस=योगसाधना द्वारा चित्त निरोध करे)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो प्रभु आराधना करते हैं वे यत्न पूर्वक चित का निरोध करें उसे भटकने से रोकें तभी अद्भुत परमात्मा उनके चित में निवास करेंगे ।
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भूले८ हू हरि नांव बिन, मति कोइ उपजै आंन८ ।
कहि जगजीवन रांम बिन, ये सब फीका ग्यांन ॥१४॥
(८-८. भूले हू हरि नांव बिन=भगवन्नामस्मरण के अतिरिक्त अन्य कोई बात भूल से भी अपने मन में नहीं सोचनी चाहिये)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि भूल से भी प्रभु स्मरण के सिवाय अन्य कुछ भी चित में नहीं रखना चाहिए प्रभु स्मरण के सिवाय अन्य ज्ञान सब व्यर्थ है ।
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निरख नूर निरमल रहै, नांम सुमरि निरदुंद९ ।
कहि जगजीवन जल किरन ज्यूं, घट मंहि भासै चंद ॥१५॥
{९. निरदुंद=निर्द्वन्द(= हर्ष विषाद आदि द्वन्द्वों से रहित)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु दर्शन से चित विकार रहित होता है स्मरण से दुविधा रहित होता है । जैसै चन्द्र किरण घट जल में पड़ती है तो ऐसे लगता है मानो अनंत दूरी का चन्द्र हमारे निकट है इसी प्रकार स्मरण से लगता है कि प्रभु चाहे कितने ही दूर हों, वे स्मरण रुपी चन्द्र किरण सदृश हमारे निकट हैं ।
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कौंण कसौटी१ करि मरै, कौंण मरै करि जोग२ । 
जगजीवन जे पाइये, रांम चरण रस भोग ॥१६॥
{१. कसौटी=जांच(=परख)} (२. जोग=योगसाधना)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि किस परीक्षा से पार पायें कौन से योग में अपनी जान लगा दें । जिससे हमें प्रभु चरणों का सानिध्य प्राप्त हो ।
(क्रमशः)

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