रविवार, 1 नवंबर 2020

*सर्वधर्म-समन्वय और श्रीरामकृष्ण*

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*भेष न रीझे मेरा निज भर्तार,*
*तातैं कीजै प्रीति विचार ॥*
*पीव पहचानें आन नहिं कोई,*
*दादू सोई सुहागिनी होई ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ पद्यांश. ६१)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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(२)
*सर्वधर्म-समन्वय और श्रीरामकृष्ण*
बलराम के पिता की उड़ीसा प्रान्त में भद्रक आदि कई स्थानों में जमींदारी है और वृन्दावन, पुरी, भद्रक आदि अनेक स्थानों में उनकी देवसेवा और अतिथिशालाएँ भी हैं । वे वृद्धावस्था में श्रीवृन्दावन में भगवान् श्यामसुन्दर के कुंज में उनकी सेवा में लगे रहते थे । 
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बलराम के पिताजी पुराने मत के वैष्णव हैं । अनेक वैष्णव भक्त, शाक्त, शैव और वेदान्तवादियों के साथ सहानुभूति नहीं रखते हैं; कोई कोई उनसे द्वेष भी करते हैं । परन्तु श्रीरामकृष्ण इस प्रकार की संकीर्णता पसन्द नहीं करते । उनका कहना है की व्याकुलता रहने पर सभी पथों तथा सभी मतों से ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है । अनेक वैष्णव भक्त बाहर से तो जप-जाप, पूजा-पाठ आदि करते हैं, परन्तु भगवान् को प्राप्त करने के लिये उनमें व्याकुलता नहीं है । सम्भव है इसीलिये श्रीरामकृष्ण बलराम के पिताजी को उपदेश दे रहे हैं ।
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श्रीरामकृष्ण(मास्टर के प्रति) - सोचा, क्यों एकांगी बनूँ ? मैंने भी वृन्दावन में वैष्णव वैरागी का भेष ग्रहण किया था । उस भाव में तीन दिन रहा । फिर दक्षिणेश्वर में राम-मन्त्र लिया था । लम्बा तिलक, गले में कंठी; फिर थोड़े दिनों के बाद सब कुछ हटा दिया । 
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“एक आदमी के पास एक बर्तन था । लोग उसके पास कपड़ा रँगवाने के लिये जाते थे । बर्तन में एक रंग तैयार रहता । परन्तु जिसे जिस रंग की आवश्यकता होती, उस बर्तन में कपड़ा डुबाने से वह उसी रंग का हो जाता । यह देखकर एक व्यक्ति विस्मित होकर रंगवाले से कहता है की तुम स्वयं जिस रंग से रंगे हो वही रंग मुझे दो ।”
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क्या इस उदाहरण द्वारा श्रीरामकृष्ण यही कह रहे हैं कि सभी धर्मों के लोग उनके पास आएँगे और आत्मज्ञान प्राप्त करेंगे ?
श्रीरामकृष्ण फिर कह रहे हैं, “एक वृक्ष पर एक गिरगिट था ! एक व्यक्ति ने देखा हरा, दूसरे ने देखा काला और तीसरे ने पीला, इस प्रकार अलग अलग व्यक्ति अलग अलग रंग देख गये । बाद में वे आपस में विवाद कर रहे हैं । एक कहता है, वह जन्तु हरे रंग का है । दूसरा कहता है, नहीं लाल रंग का, कोई कहता है पीला, और इस प्रकार आपस में सब झगड़ रहे हैं । उस समय वृक्ष के नीचे एक व्यक्ति बैठा था, सब मिलकर उसके पास गये । उसने कहा, ‘मैं इस वृक्ष के नीचे रातदिन रहता हूँ, मैं जानता हूँ, यह बहुरुपिया है । क्षण क्षण में रंग बदलता है, और फिर कभी कभी इसके कोई रंग नहीं रहता ।’
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क्या श्रीरामकृष्ण यही कह रहे हैं की ईश्वर सगुण है, भिन्न भिन्न रूप धारण करता है और फिर निर्गुण है, कोई रूप नहीं, वाक्य मन से परे है ? और वे स्वयं भक्तियोग, ज्ञानयोग आदि सभी पथों से ईश्वर के माधुर्य का रस पीते हैं ?
श्रीरामकृष्ण(बलराम के पिता के प्रति) – और अधिक पुस्तकें न पढ़ो, परन्तु भक्तिशास्त्र का अध्ययन करो, जैसे श्रीचैतन्यचरिताम्रत । 
(क्रमशः)

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