रविवार, 1 नवंबर 2020

समर्थता का अंग २१ - २६/३१

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🦚 #श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका 🦚
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भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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(#श्रीदादूवाणी ~ समर्थता का अंग २१ - २६/३१) 
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*॥ ईश्‍वर समर्थाई ॥*
*ज्यों यहु समझै त्यों कहो, यहु जीव अज्ञानी ।*
*जेती बाबा तैं कही, इन एक न मानी ॥२६॥*
*दादू परचा माँगें लोग सब, कहैं हमकौं कुछ दिखलाइ ।*
*समरथ मेरा सांइयाँ, ज्यों समझैं त्यों समझाइ ॥२७॥*
*दादू तन मन लाइ कर, सेवा दृढ़ कर लेइ ।*
*ऐसा समर्थ राम है, जे मांगै सो देइ ॥२८॥*
शाहपुरा ग्राम में एक तिलोक नाम का सेठ रहता था । किसी समय श्री दादू जी महाराज ने उसके घर पर निवास किया था । उस समय उस को बहुत ज्ञान दिया लेकिन उसने एक भी नहीं मानी प्रत्युत उसके मन में चमत्कार देखने की प्रबल इच्छा जागृत हुई, तब श्री दादू जी ने ईश्वर से प्रार्थना करी कि हे प्रभो ! यह जीव अज्ञानी है । समझाने पर भी नहीं समझता । अतः आप तो सर्व समर्थ हैं । इसको चमत्कार दिखलाकर इसकी जो जिज्ञासा है, उसको शान्त कीजिये । उस समय प्रभु की प्रेरणा से श्री दादूजी महाराज ने अपने दो रूप बनाकर उसकी जिज्ञासा को शान्त किया । अतः हे साधक ! उसको सर्व समर्थ समझकर तन मन से उसकी दृढ़ सेवा करो । क्योंकि वह भक्तों की सब कामनाओं को पूर्ण करने वाला है ।
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*॥ समर्थ साक्षी भूत ॥*
*समर्थ सो सेरी समझाइनैं, कर अणकर्ता होइ ।*
*घट घट व्यापक पूर सब, रहै निरंतर सोइ ॥२९॥*
*रहै नियारा सब करै, काहू लिप्त न होइ ।*
*आदि अंत भानै घड़ै, ऐसा समर्थ सोइ ॥३०॥*
हे परमात्मन् ! आप सर्वव्यापक हैं । सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति, पालन सब आप से ही होता है । फिर भी आपको पाप पुण्य नहीं स्पर्श करता । तथा प्रति शरीर में रहते हुए भी सुख दुःख से लिप्त नहीं होते । तथा कर्ता होकर भी अकर्ता बनते हैं । सृष्टि की उत्पत्ति आप किस विधि से करते हैं ? इन सब आशंकाओं का समाधान कीजिये ।
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*॥ कर्त्ता साक्षीभूत ॥*
*श्रम नहीं सब कुछ करै, यों कल धरी बनाइ ।*
*कौतिकहारा ह्वै रह्या, सब कुछ होता जाइ ॥३१॥*
भगवान् सृष्टि को पैदा करते हैं, लेकिन उन को जरा सा भी परिश्रम नहीं होता । क्योंकि उनके संकल्प मात्र से सृष्टि बन जाती है और उनकी सत्ता मात्र से सब कुछ होता रहता है । वे तो तमाशा देखने वाले दृष्टा मात्र हैं । जब उनको जानने वाला ज्ञानी भी सुख दुःख से लिप्त नहीं होता तो फिर परमात्मा के विषय में क्या कहा जाय यह भी उनका सर्वसामर्थ्य है । 
श्रुति में कहा है कि- वह परमात्मा सब भूतों की आत्मा है । सब कुछ करते हुए भी कभी लिप्त नहीं होते । 
गीता में भी कहा है कि- जिसको कहीं अहंकार नहीं होता जिसकी बुद्धि सांसारिक पदार्थों में लिप्त नहीं होती । वह सारे संसार का हन्ता होने पर भी न मारता है और न पुण्य पाप से युक्त होता ।
(क्रमशः)

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