गुरुवार, 5 नवंबर 2020

*देखत ही दृग नीर चल्यो ऋषि*

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*दादू सेवग सेवा कर डरै, हम थैं कछु न होइ ।*
*तूँ है तैसी बन्दगी, कर नहिं जाणै कोइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,* 
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान* 
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*मातँग ईधन बोझ निहारत,*
*चोर यहां जन कौन सु आयो ।*
*चोरत है नित दीसत नांहि सु,*
*एक दिना पकरो मन भायो ॥*
*चौकस रैन करी सब शिष्यन,*
*आवत ही पकरी शिर नायो ।*
*देखत ही दृग नीर चल्यो ऋषि,*
*बैनन से कछु जात कहायो ॥३३॥*
महर्षि मतंगजी शबरी के डाले हुये लकड़ियों के बोझ देखने लगे तो उनके मन में भी विचार हुआ कि- ऐसा चोर भक्त यहां कौन आया है जो हमारी सेवा नित्य चुरा ले जाता है और दिखाई नहीं देता । मेरे मन को यही प्रिय लग रहा है कि इस प्रेमी को एक दिन अवश्य पकड़ो । 
मतंगजी की आज्ञा सुनकर सभी शिष्य रात्रि में सावधान रहे । जब वह लकड़ियां लेकर आयी तब उसे पकड़ लिया । शबरी ने अपना मस्तक उनके चरणों में रखते हुये दीनता दिखाई । मतंगजी ने जब उसका उक्त व्यवहार देखा तो उनके नेत्रों से प्रेमाश्रु की धारा बह चली । उस समय का मतंगजी का प्रेमानन्द कुछ वचनों से कहा जा सकता है क्या? अर्थात् नहीं कहा जा सकता ।
(क्रमशः)

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