शुक्रवार, 6 नवंबर 2020

*९. निहकर्मी कौ अंग ~ १/४*

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*९. निहकर्मी कौ अंग ~ १/४*
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रांम२ रह्या तौ सब रह्या, गया सु आवै जाइ । 
जगजीवन इस अंग कौं, कलपै कवण बलाइ२ ॥१॥ 
(२-२. यदि हम अपने हृदय में परमेश्वर परमात्मा का चिन्तन करते रहते हैं तो समझो सब कुछ मंगलमय है । शेष नश्वर वस्तुएँ यदि नष्ट होती हैं, तो होती रहें । ऐसे निरर्थक कष्टप्रद विषयों पर विचार कर कौन चिन्तित हो) 
संतजगजीवन जी कहते हैं कि यदि राम स्मरण रहे तो सब कुशल है जो छूट गया वह भी जुड़ जाता है शेष यदि कुछ नष्ट होता है तो वह चिन्तनीय नहीं है, निर्थक है । 
एक न जइयो जाइ सब, जीवन सौं कहा३ काम । 
केते बिछुरैं फिरि मिलैं, जगजीवन जहां रांम ॥२॥ 
(३. कहा=क्या) 
संतजगजीवन जी कहते हैं कि एक प्रभु रहैं फिर चाहे सब जायें । उनके बिना जीवन का क्या प्रयोजन है । और उनके रहने से जो बिछुड़े हैं उनका अभाव नहीं भासता । 
रांम हमारे माल धन४, रांम हमारे जोग५ । 
रांम हमारे परम सुख, रांम हमारे भोग६ ॥३॥ 
(४. माल धन=अमूल्य धन) (५. जोग=योग साधना) 
(६. भोग=उपभोग की वस्तुएँ) 
संतजगजीवन जी कहते हैं कि राम ही हमारी पूंजी हैं, वे ही हमारा योग हैं, वे ही हमारे परम सुख के की सब वस्तुएं हैं, कारण हैं, उनसे ही हमारे उपभोग हैं । 
रांम हमारे इष्ट मंत्र७, हरि रांम हमारे राज । 
कहि जगजीवन आंन स्यूं, किंचित८ नांही काज ॥४॥ 
(७. इष्ट मंत्र=जप मन्त्र । ‘इष्ट मित्र’ भी पाठ हो सकता है) 
(८. किंचित=कुछ भी) 
राम ही हमारे इष्ट द्वारा प्रदत्त मंत्र या प्रयोजन हैं. वे ही हमारे संचालक है, हमें उनके सिवाय अन्य से कोइ भी या कुछ भी आशा नहीं है ।
(क्रमशः)

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