शुक्रवार, 6 नवंबर 2020

(“पंचमोल्लास” ५५/५७)

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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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(“पंचमोल्लास” ५५/५७)
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*सबही का अन जल त्यागना*
*नगर ढिंढोरा फेर्यो सबही,*
*अन्नपांन न लीजे कबही ।* 
*मनुष अन्न न पसुवहिं घासा,*
*पर दुख देखि दुखी है दासा ॥५५॥* 
राजा ने तब ही सारे नगर में ढिंढोरा घोषणा करवा दी कि कोई भी कब ही अन्नपान ग्रहण नहीं करेंगे । मनुष्यों को अन्न और पशुओं को घास न डाला जावे क्योंकि हरि भक्त दास दूसरों को दुखी देख कर स्वयं दुखी होते हैं ॥५५॥ 
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*गली गली चौकी बैठारी,*
*बालक नहीं चूषे महतारी ।* 
*बहुत भांति करि दई है त्रासू,*
*मनिष सहर जो भयो उदासू ॥५६॥* 
राजा ने गली गली पर रक्षाकर्मियों को बैठा दिया यह देखने के लिये कि कोई भी माता अपने बालकों को स्तनपान नहीं करवायेगी । इस प्रकार साधना की दृष्टि से अनेक प्रकार से मनुष्य पशु आदि को कष्ट दिया और मानव व शहर सभी उदास हो गये ॥५६॥ 
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*सौदा सूत न करे त्यौहारू,*
*जडि दई हाट, न लगे वजारू ।* 
*इहि विधि आवे दीन दयालू,*
*दर्सन कीजै सनमुख भालू ॥५७॥* 
नगर में खरीद बिक्री का व्यवहार कोई नहीं कर रहा है सबने दुकान बाजार बंद कर दिये हैं बाजार नहीं लग रहा । इस प्रकार कठोर साधना से द्रवित होकर दीन पर दया करने वाले दादूजी आवेंगे और उनके साक्षात रूप में दर्शन हम लोग कर सकेंगे । अपनी त्रिकुटि पर दर्शन करेंगे ॥५७॥
(क्रमशः)

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