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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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(#श्रीदादूवाणी ~ शब्द का अंग २२ - ११/१२)
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*निरंजन निराकार है, ओंकार आकार ।*
*दादू सब रंग रूप सब, सब विधि सब विस्तार ॥११॥*
ओंकार का चौथा पाद अमात्रिक होने से ब्रह्म रूप निरन्जन निराकार स्वरूप है । त्रिपादात्मक शब्द रूप ओंकार मायामय होने से साकार है । अतः नामरूपात्मक सकल जगत् साकार मायामय ओंकार से ही पैदा हुआ है ।
माण्डूक्य में लिखा है कि- ऊपर लिखे हुए मंत्र में निर्गुण निराकार ब्रह्म का चौथा पाद बतलाया गया है कि जो न देखने में आ सकता है । न वह व्यवहार में लाया जा सकता है, न ग्रहण करने में आ सकता है । न चिन्तन करने में, न बतलाने में आ सकता है, न जिसका कोई लक्षण हो सकता है । जिसमें समस्त प्रपञ्च का अभाव है । एकमात्र परमात्मा की प्रतीति ही जिसमें सार(प्रमाण) है । ऐसा सर्वथा शान्त कल्याणमय अद्वितीय तत्व पूर्णब्रह्म का चौथा पाद माना जाता है । इस प्रकार जिनका चार पादों में विभाग करके वर्णन किया गया है वे ही पूर्ण ब्रह्म परमात्मा है । उन्हीं को जानना चाहिये ।
जो चार पादवाला बतलाया गया है, वह साकार है और यहां पर अक्षर के प्रकरण में अपने नाम से अभिन्न होने के कारण तीन मात्राओं वाला ओंकार है । अ, उ, म, ये तीनों मात्राएँ ही उपर्युक्त तीन पाद है और उनके ये तीनों पाद ही ओंकार की तीन मात्राएँ है । जिस प्रकार ओंकार अपनी तीन मात्राओं से भिन्न नहीं है उसी प्रकार परमात्मा अपने पादों से अलग नहीं है । यहां पर पाद और मात्राओं की जो एकता बतलाई है वह परमात्मा की उपासना के लिये ही की गई है । इसी अभिप्राय से श्री दादूजी महाराज भी लिख रहे हैं कि- निरंजन निराकार है, ओंकार आकार इति । अर्थात् उस मायामय ओंकार स्वरूप ब्रह्म का ही यह स्वरूप रंग वाला संसार है । क्योंकि उसी से पैदा होता है ।
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*आदि शब्द ओंकार है, बोलै सब घट माँहि ।*
*दादू माया विस्तरी, परम तत्त यहु नांहि ॥१२॥*
प्रलय काल में नियत काल से परिपक्व होने वाले प्राणियों के कर्मों का उपभोग के द्वारा क्षीण होने पर संपूर्ण जगत् को अपने अन्दर लीन करके माया ईश्वर चेतन में लीन हो जाती है । यह आत्यन्तिक लय नहीं है । ऐसा मानने पर फिर सृष्टि पैदा नहीं हो सकेगी, और न सर्वथा अभाव रूप ही लय है, क्योंकि प्रतीयमान मिथ्या वस्तु का, जिसका स्वरूप प्रतिभासमात्र ही है, उसका यदि सर्वथा अभाव मान लिया जाय तो फिर उसका सदा के लिये ही अभाव हो जायगा । अतः इस लय में कार्य की प्रवृत्ति का अभाव होने के कारण सुषुप्ति की तरह जानना चाहिये । क्योंकि ईश्वर में रहने वाला प्रकाश निर्विकल्प होने से उस ईश्वर के प्रकाश से प्रकाशित होती हुई भी माया अभाव की तरह ही प्रलय काल में रहती है ।
जब प्राणियों के कर्म पक जाते हैं, अर्थात् फलोन्मुख होते हैं तब ईश्वर से माया का सृष्टि के निमित्त प्रादुर्भाव होता है । फिर परमात्मा में प्राणियों के कार्यानुसार सृष्टि रचना की इच्छा पैदा हो जाती है । उस माया से ईश्वर की इच्छा से अव्यक्त त्रिगुण बिन्दु रूप पैदा होता है । इसी को शक्तितत्त्व कहते हैं । उस बिन्दु का अचित् अंश बीज कहलाता है । चिद् अचित् दोनों अंश मिले हुए नाद कहलाते हैं । चिदंश को बिन्दु कहते हैं । अचिदंश ही शब्दार्थ उभयरूप संस्कार रूपा अविद्या कहलाती है । इस बिन्दु से नाद पैदा होता है । जो ज्ञान प्रधान विशेष वर्ण आदि से रहित शब्द ब्रह्म कहलाता है । जो सृष्टि के उपयोगी अवस्था विशेष है । यही नाद जगत् का उपादान कारण है । इसी को ‘रव’ ‘रव’ ‘वाणी’ आदि शब्दों से व्यवहृत किया जाता है ।
प्रपञ्चसार में लिखा है कि- इस बिन्दु में कुछ हलचल होने पर अव्यक्त नामक “रव” पैदा होता है । वह ही जन श्रुति(कर्ण) संपन्न होता है तब शब्द ब्रह्म कहलाता है । यह रव सर्वगत होता हुआ भी प्राणियों के मूलाधार में पवन के चलने से संस्कृत हुआ अभिव्यक्त होता है । जाने हुए अर्थ को कहने की पुरुष की इच्छा के प्रयत्न से जो योग है वह ही मूलाधार पवन से इसका संस्कार है । वह ही अभिव्यक्त शब्द ब्रह्म अपने में स्थित रहने के कारण निस्पन्द परा वाक् कहलाती है ।
इसी अभिप्राय से वाक्यपदीय में श्री हरि ने लिखा है कि- आदि अन्त से रहित जो ब्रह्म है, वह ही शब्द तत्त्व है । वह ही अक्षर है । जिसका अर्थ भाव से विवर्त होता है । जिससे सारे जगत की प्रक्रिया चलती है । इसी अभिप्राय से श्रीदादू जी महाराज लिख रहे हैं कि “आदि शब्द ओंकार है ।” इति । अर्थात् यह नाद ही प्राणियों के हृदय में स्थित अनाहत नाद रूप से हंस इस प्रकार से सुनाई देता है । यह ही सृष्टि का आदि कारण है । जीव रूप से प्राणियों में बोलता चलता आदि क्रिया करता है । यह प्रपञ्चसहित नाद मायिक है, वास्तविक ब्रह्मस्वरूप नहीं है । इसीलिये श्रीदादूजी भी लिखा रहे हैं “परम तत्व यहु नाहिं” ।
(क्रमशः)

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