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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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(“पंचमोल्लास” ६७/६९)
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*उर मंहि नहीं सु गर्ब गुमांनूं,*
*प्रेम मगन गलितांन सु ज्ञांनूं ।*
*सुंदर केसर खूब लपेटी,*
*बिलसे बसत जु हरि सों भेटी ॥६७॥*
उनके मन में किसी भी तरह का अभिमान व घमण्ड नहीं है । और वे प्रभु प्रेम में मस्त हैं और ब्रह्म ज्ञान से परिपूर्ण हैं । उन्होंने जैसे मस्तक पर सुंदर केशर लगा रखी है जैसे कि हरि से भेट करके वे आनन्द से परिपूर्ण हैं ॥६७॥
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*अंतरजामी हिरदय ठांय,*
*मुखां बखांनें राम ही राम ।*
*पैंड पैंड परि कीजै ध्यानू,*
*छिन छिन होवे ब्रह्म मिलानूं ॥६८॥*
श्री दादूजी के हृदय में ब्रह्म का वास स्थान है । एवं मुख से निरन्तर राम राम का उच्चारण हो रहा है । पद पद पर ब्रह्म ध्यान का ध्यान कर रहे हैं और प्रतिक्षण ब्रह्म से साक्षात्कार मिलन हो रहा है ॥६८॥
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*विलास जु कीजे हरि के संगू,*
*लग्यौ उनमनी हरि को रंगू ।*
*जपै जगत गुरु बारंबारू,*
*पहुंचे सदनि देवी के द्वारू ॥६९॥*
संत दादूजी हरि के साथ आनंद प्रमोद कर रहे हैं और निश्चल निरपक्ष के रूप में हरि के रंग में रंगे हुये हैं । जगतगुरु दादूजी निरन्तर ब्रह्म जाप में लगे हैं और इस अवस्था में देवी के मन्दिर द्वार पर पहुंचते हैं ॥६९॥
(क्रमशः)

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