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*शरण तुम्हारी अंतर वास,*
*चरण कमल तहँ देहु निवास ॥*
*अब दादू मन अनत न जाइ,*
*अंतर वेधि रह्यो ल्यौ लाइ ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ पद्यांश. १९)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*राधाकृष्णलीला का अर्थ । रस और रसिक*
“असल बात यह है कि उनसे प्रेम करना चाहिए, उनके माधुर्य का आस्वादन करना चाहिए । वे रस हैं और भक्त रसिक; भक्त उस रस का पान करते हैं । वे पद्म हैं और भक्त भौंरा, भक्त पद्म का मधु पीता है ।
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“भक्त जिस प्रकार भगवान् के बिना नहीं रह सकता, भगवान् भी भक्त के बिना नहीं रह सकते ! उस समय भक्त रस बन जाता है और भगवान् बनते हैं रसिक; भक्त बनता है पद्म और भगवान् बनते हैं भौंरा ! वे अपने माधुर्य का आस्वादन करने के लिए दो बने हैं, इसीलिए राधाकृष्ण-लीला हुई ।
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“तीर्थ, गले में माला, नियम, ये सब पहले-पहल करने पड़ते हैं । वस्तु की प्राप्ति हो जाने पर, भगवान् का दर्शन हो जाने पर बाहर का आडम्बर धीरे धीरे कम होता जाता है । उस समय उनका नाम लेकर रहना और स्मरण-मनन करना ।
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“सोलह रुपयों के पैसे अनेक होते हैं, परन्तु जब सोलह रुपये इकट्ठे किए जाते हैं, तो उतने अधिक नहीं दीखते । फिर उनके बदले में जब गिन्नी* बनायी तो कितना कम हो गया ! फिर उसे बदलकर यदि छोटासा हीरा लाओ तो लोगों को पता तक नहीं लगता । (*उस समय एक गिन्नी का मूल्य सोलह रुपये था ।)
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गले में माला, नियम आदि न रहने से वैष्णवगण आक्षेप करते हैं, क्या इसीलिए श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं कि ईश्वरदर्शन के बाद माला, दीक्षा आदि का बन्धन उतना नहीं रह जाता ? वस्तु प्राप्त होने पर बाहर का काम कम हो जाता है ।
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श्रीरामकृष्ण(बलराम के पिता के प्रति) – “कर्ताभजा सम्प्रदायवाले कहते हैं कि भक्त चार प्रकार के होते हैं । प्रवर्तक, साधक, सिद्ध और सिद्ध का सिद्ध । प्रवर्तक तिलक लगाते हैं, गले में माला धारण करते हैं और नियम पालन करते हैं । साधक-इनका उतना बाहर का आडम्बर नहीं रहता; उदाहरणार्थ, बाउल । सिद्ध-जिसका स्थिर विश्वास है कि ईश्वर हैं । सिद्ध के सिद्ध जैसे चैतन्यदेव, उन्होंने ईश्वर का दर्शन किया है और सदा उनसे वार्तालाप करते हैं । सिद्ध के सिद्ध को ही वे लोग साईं कहते हैं । साईं के बाद और कुछ नहीं रह जाता ।
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‘साधक भिन्न भिन्न प्रकार के होते हैं । सात्त्विक साधना गुप्त रूप से होती है । इस प्रकार का साधक साधन-भजन को छिपाता है । देखने से वह साधारण लोगों की तरह जान पड़ता है । मच्छरदानी के भीतर बैठा ध्यान करता है ।
“राजसिक साधक बाहर का आडम्बर रखता है, गले में जपमाला, भेष, गेरुआ वस्त्र, रेशमी वस्त्र, सोने के दानेवाली जपमाला, मानो साइनबोर्ड लगाकर बैठना !”
(क्रमशः)

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