सोमवार, 2 नवंबर 2020

समर्थता का अंग २१ - ३२/३६

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🦚 #श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका 🦚
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भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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(#श्रीदादूवाणी ~ समर्थता का अंग २१ - ३२/३६) 
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*लिपै छिपै नहिं सब करै, गुण नहिं व्यापे कोइ ।* 
*दादू निश्‍चल एक रस, सहजैं सब कुछ होइ ॥३२॥* 
ईश्वर सब कुछ कार्य करता है फिर भी किसी के धर्मों से लिप्त नहीं होता । क्योंकि वह असंग हैं । वेद में कहा है कि-असंगों नहि सज्जते ॥ 
और वह गुप्त भी नहीं रह सकता उसका प्रकाश सब जगह पर फैल रहा है । और वह सत्त्वादिगुणों से बंधता भी नही । किन्तु निश्चल एकरस रहता है । अब भी उसी की सत्ता से सब कुछ हो रहा है । 
*बिन गुण व्यापे सब किया, समर्थ आपै आप ।* 
*निराकार न्यारा रहै, दादू पुन्य न पाप ॥३३॥* 
सर्वसमर्थ परमात्मा बिना किसी सहायता के सत्त्वादिगुणों के बिना ही निर्गुण निराकार होता हुआ सृष्टि को बना दिया और किसी पाप पुण्य से लिप्त नहीं होता । क्योंकि यह आत्मा असंग है ऐसा श्रुति में कहा है । किन्तु साक्षी की तरह संपूर्ण लोक व्यवहार को अखिन्न बुद्धि वाला होते हुए देखता रहता है । 
*॥ ईश्‍वर समर्थाई ॥* 
*समता के घर सहज में, दादू दुविध्या नांहि ।* 
*सांई समर्थ सब किया, समझि देख मन मांहि ॥३४॥* 
वह परमात्मा सर्वसमर्थ है । समता गुण के तो वह सागर ही हैं । उसमें किसी प्रकार की दुविधा नहीं है । न वह शुभ अशुभ कार्यों में आसक्त होता । किन्तु सर्वत्र स्नेह रहित होता हुआ साक्षी की तरह संपूर्ण प्रपञ्च के व्यवहारों को देखता रहता है । 
गीता में कहा है कि- हे अर्जुन मैं सभी प्राणियों समभाव से रहता हूँ, न कोई मेरा द्वेषी और न कोई मेरा मित्र है । 
*पैदा किया घाट घड़, आपै आप उपाइ ।* 
*हिकमत हुनर कारीगरी, दादू लखी न जाइ ॥३५॥* 
पञ्चभूतों की रचना करके उनके द्वारा कैसे यह स्थूल शरीर बनाया उसमें जीव का प्रवेश कैसे किया । यह उस प्रभु का महान् सामर्थ्य है । उसकी बुद्धि तथा निर्माण कला और गुणों का अन्त ही नहीं है । 
*यंत्र बजाया साज कर, कारीगर करतार ।* 
*पंचों का रस नाद है, दादू बोलणहार ॥३६॥* 
परमेश्वर अद्भुत कारीगर है । जिसने पंच भूतों से स्थूल शरीर बनाकर उसमें यथास्थान पर पंचज्ञानेन्द्रिय पञ्चकर्मेन्द्रिय तथा मनबुद्धि की स्थापना करके उसको सजा दिया और जीव भाव से शरीर में मूर्धा का छेदन करके उसमें प्रविष्ट हो गया और वहां पर स्थित होकर नेत्रों से देखता है घ्राणेन्द्रिय से सूंघता है । कानों से सुनता है, मन से मनन करता, बुद्धि से विचार करता, वाणी से बोलता है, पैरों से चलता, हाथों से काम करता है । इस प्रकार जड़ शरीर में प्रवेश करके उसको चेतन सा बना दिया । 
ऐतरेयोपनिषद् में- उस परमात्मा ने मनुष्य शरीर की सीमा को चीरकर उसके द्वारा शरीर में प्रविष्ट हो गया । यह द्वार विधृति नाम से प्रसिद्ध है । यह आनन्द देने वाला है । अर्थात् ब्रह्म प्राप्ति का स्थान है ।
(क्रमशः)

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