शुक्रवार, 6 नवंबर 2020

= १७२ =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*दादू स्वाद लागि संसार सब, देखत परलै जाइ ।*
*इन्द्री स्वारथ साच तजि, सबै बंधाणै आइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ माया का अंग)*
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साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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एक युवक एक संत के पास रात को सत्संग के लिये जाता था, जब उसकी पत्नि आई तब उसने जाना बंद कर दिया ।
संत ने कहा - आज कल सत्संग में नहीं आता ।
युवक - घर वाली मेरे बिना नहीं रह सकती है, उसका मुझमें बहुत प्रेम है ।
संत - स्वार्थ का प्रेम सब में ही होता है ।
युवक - नहीं नहीं उसका प्रेम सच्चा प्रेम है ।
संत - परीक्षा कर ले । कल उसे कह आना कि - खीर और चूरमा बनाना, फिर तू जाकर प्राणायाम कर लेना । उसने वैसा ही किया ।
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रसोई तैयार करके स्त्री ने पति को बुलाया किंतु वह न बोला तब जाकर देखा कि वह अचेत पड़ा है । उसने सोचा यह तो मर गया । अब यदि प्रथम ही रोऊँगी तो भूखे मरूंगी इसलिये खीर तो खा लूं और चूरमा रख दूं । खीर खा, चूरमा को ठीक से रखकर रोना आरम्भ किया । मुहल्ले के लोग आ गये ।
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वह रोती हुई बोली - "साँई स्वर्ग पधारिया, कुछ सांनू भी अक्ख ।"
यह सुन - युवक यह बोला - "खीर सपासप मारिया, कुछ पिंडी भी चक्ख ।" उठ बैठा और उसकी पोल खोल दी तथा पुन: भजन सत्संग में लग गया ।
प्रेम करत है स्वामी से, नारी स्वारथ काज ।
खीर चुरमा खाय कर, गयी स्वामि से लाज ॥७२॥

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