सोमवार, 9 नवंबर 2020

(“पंचमोल्लास” ६४/६६)

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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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(“पंचमोल्लास” ६४/६६)
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*संतों ने आदेश दिया सब कोई भोजन लो*
*तवै नृप से वचन बखाना,*
*मनिष हुं भोजन पशु को दाना ।* 
*सब काहूं को भोजन दीया,*
*जैता दुख तैता सुख कीया ॥६४॥* 
तब राजा ने सबको यह वचन कहा कि प्रत्येक मनुष्य को अन्नादि भोजन और पशुओं को घास दाना दिया जावे । सारी प्रजा को भोजन दिया और जितना दुख पहले पाया था उतना ही सुख अब राजा ने सबके लिये कर दिया ॥६४॥ 
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*केदार देश टापू माहि, नृपति आराध कीयो ।* 
*अन्नजल त्याग दियो, नरनारी सबहि ॥* 
*हा हा कार भयो जब, आमावती सुने तब,*
*बैगही पधारे स्वामी, दुख मेट्यो सबहि ।*
*स्वामी आये देस मंझारू,*
*निर्गुण स्वरूप सुनिर्मल सारू ।* 
*आरति सहित जो ध्यावें स्वामी,*
*रामति कांनी अंतरजामी ॥६५॥* 
स्वामी दादूजी केदार देश में आये उनका स्वरूप रजतमादि गुणों से रहित सूक्ष्म निर्मल व सार रूप था । जो कोई आरति प्रार्थना सहित दादूजी का ध्यान करता है अंतरजामी उसमें रमण करते हैं ॥६५॥ 
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*श्री दादूजी का स्वरूप महिमा*
*गछत गछत जो चालै पंथा,*
*झीणां स्वरूप निर्गुण कंथा ।* 
*पैंड पैंड अमीरस पीजे,*
*पैड़ पैड परि ज्ञान कथीजै ॥६६॥* 
श्री दादूजी धीरे-धीरे रास्ते पर चल रहे हैं उनका सूक्ष्म स्वरूप है और निर्गुण ब्रह्म ही उनका वस्त्र है । पद पद पर वे ब्रह्म रस का पान कर रहे हैं और पद पद पर ज्ञान की चर्चा जिज्ञासुओं से कर रहे हैं ॥६६॥ 
(क्रमशः)

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