सोमवार, 9 नवंबर 2020

*शिवनाथ और सत्यभाषण*

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*साचे साहिब को मिले, साचे मारग जाइ ।*
*साचे सौं साचा भया, तब साचे लिये बुलाइ ॥*
*दादू साचा साहिब सेविये, साची सेवा होइ ।*
*साचा दर्शन पाइये, साचा सेवक सोइ ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ साँच का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*शिवनाथ और सत्यभाषण* 
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उपासना के पूर्व श्रीरामकृष्ण विजयकृष्ण गोस्वामी और दूसरे ब्राह्मभक्तों के साथ प्रसन्नतापूर्वक वार्तालाप कर रहे हैं । समाजगृह में दीप जल चुका है, अब शीघ्र ही उपासना शुरू होगी ।
श्रीरामकृष्ण बोले, “क्योंजी, क्या शिवनाथ न आएगा ?” एक ब्राह्मभक्त ने कहा, “जी नहीं, आज उनको कई काम हैं आ न सकेंगे ।”
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श्रीरामकृष्ण- शिवनाथ को देखने से मुझे बड़ा आनन्द होता है । मानो भक्तिरस में डूबा हुआ है । और जिसे बहुत लोग मानते-जानते हैं उसमें ईश्वर की कुछ शक्ति अवश्य रहती है । परन्तु शिवनाथ में एक बहुत बड़ा दोष है-उसकी बात का कोई निश्चय नहीं रहता । मुझसे उसने कहा था, एक बार वहाँ(दक्षिणेश्वर) जाएँगे, परन्तु फिर नहीं आया और न कोई खबर ही भेजी; यह अच्छा नहीं है । 
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एक यह भी कहा है कि सत्य बोलना कलिकाल की तपस्या है । दृढ़ता के साथ सत्य को पकड़े रहने से ईश्वरलाभ होता है । सत्य की दृढ़ता न रहने से क्रमशः सब नष्ट हो जाता है । यही सोचकर मैं अगर कभी कह डालता हूँ, मुझे शौच को जाना है, फिर शौच को जाने की आवश्यकता न भी रहे, तो भी एक बार गड़वा लेकर झाऊतल्ले की ओर जाता हूँ । यही भय लगा रहता है कि कहीं सत्य की दृढ़ता न खो जाए । 
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इस अवस्था के बाद हाथ में फूल लेकर माँ से मैंने कहा था, ‘माँ, यह लो तुम अपना ज्ञान, यह लो अपना अज्ञान, मुझे शुद्धा भक्ति दो माँ; यह लो अपना भला, यह लो अपना बुरा, मुझे शुद्धा भक्ति दो माँ; यह लो अपना पुण्य, यह लो अपना पाप, मुझे शुद्धा भक्ति दो माँ ।’ जब यह सब मैंने कहा था, तब यह बात नहीं कह सका कि माँ, यह लो अपना सत्य, यह लो अपना असत्य । माँ को सब कुछ तो दे सका, परन्तु सत्य न दे सका । 
(क्रमशः)

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