मंगलवार, 17 नवंबर 2020

शब्द का अंग २२ - २१/२३

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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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(#श्रीदादूवाणी ~ शब्द का अंग २२ - २१/२३)
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*दादू भुरकी राम है, शब्द कहैं गुरु ज्ञान ।*
*तिन शब्दों मन मोहिया, उनमन लागा ध्यान ॥२१॥*
राम की भक्ति ही कल्पवृक्ष की तरह सर्वार्थसाधक होने से अद्भुत शक्ति शालिनी है । भक्तिप्रधान शब्दों से मेरा मन मोहित होता हुआ संसार से उदासीन होकर निर्विकल्प समाधि में प्रतिदिन समाहित रहता है ।
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*शब्दों माहिं राम धन, जे कोई लेइ विचार ।*
*दादू इस संसार में, कबहुं न आवे हार ॥२२॥*
परा, पश्यन्ती, मध्यमा, वैखरी नाम से चार प्रकार की वाणी होती है । जिनमें परा वाणी मूलाधार में स्थित पवन से संस्कार(युक्त) की गई और मूलाधार में ही स्थित रहने वाली स्पन्द(हल चल) से शून्य विन्दुरूपिणी शब्द ब्रह्मस्वरूपा है । पश्यन्ती वाक् नाभि से चलने वाले पवन से अभिव्यक्त होकर केवल मन के द्वारा ही जानी जाती है । ये दोनों वाणी योगियों को निर्विकल्प सविकल्प समाधि में प्रतीत होती है । 
मूलाधार से चलकर ऊपर आने वाले श्वास से अभिव्यक्त तत्तदर्थ की वाचक शब्द स्फोटरूप श्रोत्र से जिसका ग्रहण न हो सके अति सूक्ष्म जप में जिसका बुद्धि से भी ग्रहण न हो सके वह मध्यमा कहलाती है । मूलाधार से चलकर पवन जब मुख में आकर मूर्धा से टकराती है और वापस लौट कर तालुआदि स्थानों के साथ उसका स्पर्श होने से अभिव्यक्त होती है । उसको वैखरी वाणी कहते हैं । यह दूसरे पुरुषों द्वारा भी सुनी जा सकती है । 
लिखा है कि- परा वाणी मूलाधार चक्र में, पश्यन्ती नाभि देश में, मध्यमा हृदय देश में रहती है । वैखरी वाणी कण्ठ प्रदेश में रहती है । वैखरी वाणी से होने वाला नाद श्रवणेन्द्रिय गोचर है । मध्यमा से उत्पन्न नाद स्फोटका अभिव्यंजक है । वैखरी तथा मध्यमा इन दोनों से एक साथ ही नाद उत्पन्न होता है । मध्यमा से होने वाला नाद अर्थ वाचक स्फोटात्मक शब्द का अभिव्यंजक है । वैखरी से उत्पन्न नाद श्रवणेन्द्रियग्राह्य होता हुआ भी वैखरी नाद की तरह निरर्थक है । मध्यमा का नाद सूक्ष्मतर कर्णपुट बंद करके सुनने से सूक्ष्म वायु से अभिव्यक्त होता है । यही शब्द ब्रह्मस्फोट है । यह स्फोटात्मक नाद ब्रह्म रूप होने से नित्य है । 
वाक्यपदीय में श्री हरि लिखते हैं कि- आदि अन्त रहित जो ब्रह्म है ब्रह्म है वह ही शब्द-तत्त्व है । जो अक्षर कहलाता है । यही अर्थभाव से विवर्तित होता है । जिससे सारे जगत् की प्रक्रियायें होती है । जो अन्दर ज्योतिः स्वरूप अविनाशिनी परा वाणी है उसका साक्षात्कार होने पर जन्म मरण का अधिकार समाप्त हो जाता है । 
ऋगवेद में- विद्वान्, ब्राह्मण चार प्रकार की वाणी बतलाते है । जिन में तीन वाणी परा पश्यन्ती मध्यमा तो गुहा में स्थित रहती है । कोई उन का व्यापार नहीं होता । जिसको मनुष्य बोलते हैं यह चौथी वाणी वैखरी वाणी कहलाती है । आदि अकार और अन्त्य हकार के संयोग से अहं बनता है और इकार से लेकर हकार पर्यन्त जो वर्ण हैं वे इसी अहं से ही बनते हैं । यह सारा जगत् ज्ञान स्वरूप परावाणी स्वरूप है । इसी से पश्यन्ती मध्यमा वाणी पैदा होती है । इसी अभिप्राय से श्री महर्षि दादूजी लिखा रहे हैं कि- “शब्दों मांहै रामधन” अर्थात् परा पश्यन्ती मध्यमा इन तीन प्रकार की वाणी में ही रामरुपी धन गुप्त है । कोई साधक इनका विचार करके ब्रह्म साक्षात्कार कर लेता है तो वह निश्चित संसार बन्धन से मुक्त हो जाता है ।
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*दादू राम रसायन भर धर्‍या, साधुन शब्द मंझार ।*
*कोई पारखि पीवै प्रीति सौं, समझै शब्द विचार ॥२३॥*
सन्तों के शब्दों में रामरसायन भरा पड़ा है । जो सब रोगों को दूर करने वाला है । कोई कोई साधक ही इसकी परीक्षा करके बार बार विचार करके उसके अर्थ को जान कर प्रीतिपूर्वक राम रसायन रस भक्ति का पान करता है ।
(क्रमशः)

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