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*ब्रह्म भक्ति जब उपजै, तब माया भक्ति बिलाइ ।*
*दादू निर्मल मल गया, ज्यूँ रवि तिमिर नसाइ ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ स्मरण का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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ब्राह्मसमाज की पद्धति के अनुसार उपासना होने लगी । आचार्यजी वेदी पर बैठ गए । उद्बोधन-मन्त्र के बाद आचार्यजी परब्रह्म को लक्ष्य करके वेदोक्त महामन्त्रों का उच्चारण करने लगे । ब्राह्मभ्क्तगण स्वर मिलाकर प्राचीन आर्यऋषियों के मुख से निकले हुए, उनकी पवित्र रसनाओं द्वारा उच्चारित नामों का कीर्तन करने लगे; कहने लगे-
“सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म,
आनन्दरुपममृतं यद्विभाति,
शान्तम् शिवमद्वैतम् शुद्धमपापविद्धम् ।”
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प्रणवसंयुक्त यह ध्वनि भक्तों के हृदयाकाश में प्रतिध्वनित होने लगी । अनेकों के अन्तस्तल में वासना का निर्वाण-सा हो गया । चित्त बहुत-कुछ स्थिर और ध्यानोन्मुख होने लगा । सब की आँखें मूँदी हुई हैं- थोड़ा देर के लिए सब कोई वेदोक्त सगुण ब्रह्म का चिन्तन करने लगे ।
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श्रीरामकृष्णदेव भावमग्न हैं । निःस्पन्द, स्थिरदृष्टि, निर्वाक्, चित्रपुत्तलिका की तरह बैठे हुए हैं । आत्मापक्षी न जाने कहाँ आनन्दपूर्वक विहार कर रहे हैं, शरीर शून्य मन्दिर-सा पड़ा हुआ है ।
समाधि के कुछ समय बाद श्रीरामकृष्णदेव आँखें खोलकर चारों और देख रहे हैं । देखा, सभा के सभी मनुष्य आँखें बन्द किए हुए हैं ।
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तब श्रीरामकृष्णदेव ‘ब्रह्म’ ‘ब्रह्म’ कहकर एकाएक खड़े हो गए । उपासना के बाद ब्राह्मभक्त-मण्डली मृदंग और करताल लेकर संकीर्तन करने लगी । प्रेम और आनन्द में मग्न होकर श्रीरामकृष्ण भी उनके साथ मिल गए और नृत्य करने लगे । सब लोग मुग्ध होकर वह नृत्य देख रहे हैं । विजय और दूसरे भक्त भी उन्हें घेरकर नाच रहे हैं ।
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कितने लोग तो यह दृश्य देखकर ही कीर्तन का आनन्द लेते हुए संसार को भूल गए – नामामृत पीकर थोड़ी देर के लिए विषय का आनन्द भूल गए – विषयसुख का स्वाद जान पड़ने लगा ।
कीर्तन हो जाने पर सब ने आसन ग्रहण किया । श्रीरामकृष्ण क्या कहते हैं, यह सुनने के लिए सब लोग उन्हें घेरकर बैठे ।
(क्रमशः)

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