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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*११. भगति संजीवनी कौ अंग ~ २५/२८*
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कहि जगजीवन रांमजी, सौड़ि५ सपेदी६ नांम७ ।
भगति तुम्हारी सेज हरि, अंग वोढ़ण सब ठांम ॥२५॥
(५. सौड़ि=पुरानी रजाई) {६. सपेदी-सफेदी(=उजलापन)}
(७. नांम=भगवान् का नांम)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि यह देह रुपी रजाई आपके नाम रुपी स्मरण से उजली या सफेद है इसे आपकी शरण रुपी शैय्या पर रखा है अब आप इसे उचित रंग में रंगकर अंगीकार योग्य करें ।
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कहि जगजीवन रांमजी, वपु८ ले सुन्नि समाइ ।
सौंज सकल तुमको चढ़ै, सो मति९ दीजै आइ ॥२६॥
(८. वपु=शरीर) {९. मति=बुद्धि(=समझ, ज्ञान)}
संतजगजीवन जी कहते है कि यह देह शून्य में समाये । और सम्पूर्ण रुप से आपके चरणों में चित् रहे ऐसी मति कीजिये प्रभु ।
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सौंज१ सकल तुमको चढ़ै, भगति अखंडित होइ ।
कहि जगजीवन रांमजी, यहु सुख दीजै मोहि ॥२७॥
(१. सौंज=नेवेद्य आदि पूजा के साधन)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि मेरी सारी पूजा आपके लिये है आप अखण्डित भक्ति का प्रसाद दें यह मेरा सबसे महत्त सुख होगा जो आप मुझे देंगे ।
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रांम भगति रांम हि परस, करै सो पावै रांम ।
कहि जगजीवन जन लहै, भाव भगति भजि नांम ॥२८॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो प्रभु की भक्ति कर प्रभु का सानिध्य पाते हैं वे ही प्रभु को पाते हैं । वे जन ही भाव भक्ति से स्मरण करते हैं ।
(क्रमशः)

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