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*दादू जे हम चिन्तवैं, सो कछु न होवै आइ ।*
*सोई कर्त्ता सत्य है, कुछ औरै कर जाइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ समर्थता का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*साथ सहेलिन आवत बाग हिं,*
*होम जुदी छवि देखत रीझी ।*
*कागद पाग लियो झुक बाँचत,*
*देन लिख्यो विष तात हा खीजी ॥*
*नाम हुतो विषया दृग काजल,*
*ले विषया करके रस-भीजी ।*
*आन मिली फिर आलिन में मद,*
*लालन ध्यान गई गृह धीजी ॥६१॥*
उसी समय राजकुमारी चम्पकमालिनी और मंत्री पुत्री विषया अपनी सहेलियों के साथ बाग में घूमने आई थी । संयोगवश अकेली ही विषया जहां चन्द्रहास सोये वे वहां चली गई । और इस परम सुन्दर युवक को देखकर वह मुग्ध हो गई । फिर मस्तक में बंधी हुई पगड़ी में एक पत्र लगा देखा, तब नीची झुककर पत्र को खैंच लिया और पढ़ा तो अपने पिता का लिखा हुआ है तथा उसमें लिखा है विष दे देना । तब पिता पर रुष्ट हुई किन्तु फिर उसने सोचा, पिताजी इस कुमार से मेरा विवाह करना चाहते हैं परन्तु लिखने में एक अक्षर भूल गये हैं, अतः वह मैं बना दूं ।
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उसने बड़ी चतुरता के साथ नेत्रों के काजल की कालिमा से विष का विषया बना दिया । फिर पत्र को पाग में लगाकर प्रेमरस में भीगी हुई पुनः अपनी सहेलियों में आ मिली । फिर प्रेम रूप मद्य से मस्त प्रिय राजकुमार का ध्यान करती हुई तथा यह विश्वास करके कि मेरा विवाह इसी कुमार से होगा अपने घर को चली गई ।
(क्रमशः)

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